सांस्कृतिक धरोहर और आस्था का संगम
राजस्थान के झुंझुनूं शहर में मोहर्रम का पर्व एक अलग ही सांस्कृतिक रंग लेकर आता है। वैसे तो शहर में करीब 11 ताजिये निकाले जाते हैं, लेकिन धोबियान बिरादरी द्वारा तैयार किया गया चांदी का ताजिया अपनी खास बनावट और गौरवशाली इतिहास के चलते लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहता है। बीते 60 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा आज झुंझुनूं की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। मोहर्रम के दिनों में इस ताजिए की जियारत करने के लिए न केवल स्थानीय लोग, बल्कि आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में अकीदतमंद उमड़ते हैं।
वर्ष 1962 से शुरू हुआ ऐतिहासिक सफर
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत वर्ष 1962 में हुई थी। उस दौर में ताजिया काफी छोटा हुआ करता था। शुरुआती दौर में इसका आकार मात्र आधा फीट था और इसे बनाने में लगभग आधा किलो चांदी का प्रयोग किया गया था। समय के साथ-साथ श्रद्धालुओं का विश्वास और सहयोग बढ़ता गया। लोगों ने अपनी मन्नतें पूरी होने पर चांदी का चढ़ावा चढ़ाना शुरू किया, जिससे इस ताजिए का स्वरूप निरंतर भव्य होता गया। आज यह ताजिया अपनी 9 फीट की ऊंचाई और करीब 9 किलो चांदी की चमक के साथ श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
परंपरा की दिलचस्प शुरुआत
इस चांदी के ताजिए के पीछे एक बेहद रोचक कहानी जुड़ी है। पहले धोबियान बिरादरी की ओर से सामान्य तौर पर चादर और पन्नी से बना ताजिया निकाला जाता था। वर्ष 1962 में पिलानी की रहने वाली एक महिला श्रद्धालु ने अपनी अकीदत के तौर पर चांदी का बना हथेली के आकार का एक छोटा ताजिया भेंट किया। यह घटना तत्कालीन लाइसेंसधारी गुलाम अहमद खोखर के मन में रच-बस गई। उन्होंने इसी से प्रेरणा लेकर पूर्ण रूप से चांदी का ताजिया तैयार करवाने का साहसी निर्णय लिया। देखते ही देखते श्रद्धालुओं के दान और सहयोग से चांदी की मात्रा में इजाफा होता गया और ताजिया एक भव्य कलाकृति में तब्दील हो गया।
विशेष व्यवस्था और जियारत
अन्य ताजियों के विपरीत, इस चांदी के ताजिए की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे कर्बला नहीं ले जाया जाता है। सुरक्षा और पवित्रता को ध्यान में रखते हुए, इसे चौपदारान मस्जिद के नीचे वाले चौक में दो दिनों के लिए सजाया जाता है। श्रद्धालु इन दो दिनों में बड़ी संख्या में यहां आकर ताजिये के दर्शन करते हैं। मोहर्रम की 10वीं तारीख की रात को इसे पूरे सम्मान के साथ वापस इमामबाड़े में सुरक्षित रख दिया जाता है। हर साल इसकी सजावट और रूपरेखा में कुछ नयापन देखने को मिलता है, जो इसे पहले से और भी अधिक आकर्षक बनाता है।
पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रखा विश्वास
इस पवित्र परंपरा को आगे बढ़ाने का काम गुलाम अहमद खोखर के परिवार द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी किया जा रहा है। वर्तमान में यह ताजिया केवल मुस्लिम समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि आस्था के प्रतीक के रूप में स्थानीय हिंदू समाज के लोगों के लिए भी सम्मान का विषय है। लोग इसकी बारीक कारीगरी की जमकर सराहना करते हैं। यह ताजिया इस बात का प्रमाण है कि किस तरह से एक छोटी सी शुरुआत सामूहिक सहयोग से एक महान परंपरा में बदल सकती है। इस वर्ष भी मोहर्रम के अवसर पर चांदी के इस ताजिए को विशेष रूप से सजाया और संवारा गया है, जो शहर में शांति, सद्भाव और आपसी भाईचारे की मिसाल पेश कर रहा है।
https://hindi.news18.com/photogallery/rajasthan/jhunjhunu-jhunjhunus-unique-silver-9-feet-tall-silver-taziya-local18-10604998.html