दिल्ली में हाल ही में हुए एक बड़े अग्निकांड ने पूरे देश में अग्नि सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेकिन जब बात मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर की आती है, तो हालात और भी चिंताजनक नजर आते हैं। करीब 35 लाख की आबादी वाले इस शहर का दमकल विभाग संसाधनों की भारी कमी, पुराने पड़ चुके उपकरणों और कर्मचारियों के अभाव से जूझ रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर शहर में कोई बड़ी आगजनी की घटना हो जाए, तो क्या विभाग उससे निपटने के लिए तैयार है।
वाहनों की हालत खस्ता
इंदौर नगर निगम के अधीन चलने वाले फायर विभाग के पास कुल 30 दमकल वाहन हैं, मगर इनमें से सिर्फ 20 ही चालू हालत में हैं, जबकि 10 वाहन पूरी तरह कंडम घोषित किए जा चुके हैं। शहर में गांधी हॉल, मोती तबेला, किला मैदान, जीएनटी मार्केट और सांवेर रोड समेत कई प्रमुख फायर स्टेशन संचालित होते हैं, लेकिन इन सबकी संसाधन संबंधी स्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही है।
कर्मचारियों की कमी, फायर एसपी का पद तक नहीं
विभाग में फिलहाल कुल 97 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से करीब 70 आउटसोर्स कर्मचारी हैं। इन कर्मचारियों को सीमित प्रशिक्षण देने के बाद ही जिम्मेदारी सौंप दी गई है। हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग में फायर एसपी का पद तक मौजूद नहीं है और पूरी कमान निगम प्रशासन के स्तर पर ही संभाली जा रही है।
6 में से केवल तीन फायर बुलेट चालू
संकरी गलियों और भीड़भाड़ वाले बाजारों में काम आने वाली 6 फायर बुलेट में से सिर्फ तीन ही चालू हैं। सर्राफा जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में आग लगने पर यही छोटे वाहन सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं ऊंची इमारतों में आग बुझाने के लिए शहर के पास केवल एक हाइड्रोलिक प्लेटफॉर्म वाहन है, जो बीते कई वर्षों से खराब पड़ा हुआ है।
सुरक्षा उपकरणों का टोटा
सूत्रों की मानें तो दमकलकर्मियों के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण भी नहीं हैं। ब्रीदिंग अपरेटस (BA सेट) के ज्यादातर उपकरण खराब हो चुके हैं, फायर सूट कंडम हालत में हैं और दस्ताने जर्जर हो चुके हैं। बचाव कार्य के लिए जरूरी जंपिंग कुशन तक उपलब्ध नहीं हैं और कई आवश्यक उपकरणों की कमी लगातार बनी हुई है।
चौथी मंजिल से ऊपर बेबस विभाग
सबसे गंभीर चिंता हाईराइज इमारतों को लेकर है। बताया जा रहा है कि मौजूदा संसाधनों के सहारे विभाग चौथी मंजिल से ऊपर असरदार तरीके से आग पर काबू पाने में सक्षम नहीं है, जबकि शहर में ऊंची इमारतों और कमर्शियल कॉम्प्लेक्स की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। साल 1993 में करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गई हाइड्रोलिक फायर गाड़ी आज रखरखाव के अभाव में कबाड़ में तब्दील हो चुकी है।
कौन लेगा शहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी?
दिल्ली जैसी किसी बड़ी घटना की आशंका के बीच इंदौर की अग्नि सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आखिर 35 लाख आबादी वाले इस शहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन उठाएगा और क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है।
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