सोयाबीन की खेती से बंपर मुनाफा: मौसम की मार से फसल को बचाएंगी ये खास किस्में

विंध्य क्षेत्र के किसानों के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में और वैज्ञानिक बुआई की तकनीकें कमाई बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं। कृषि विशेषज्ञों ने कम समय में तैयार होने वाले बीजों और मेढ़-कूंड पद्धति को अपनाने की सलाह दी है।

सोयाबीन की खेती में बदलाव की जरूरत

मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में सोयाबीन की खेती करने वाले किसान पिछले कुछ समय से मौसम की अनिश्चितता और कम मुनाफे के कारण परेशान हैं। कई किसानों ने इस फसल से किनारा भी कर लिया है, लेकिन कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सही बीज और वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग किया जाए, तो सोयाबीन अभी भी किसानों की आय का एक बड़ा स्रोत बन सकता है। किसान सलाहकार अवनीश पटेल के अनुसार, खेती के लिए सही योजना बनाना बहुत जरूरी है। इसमें खेत की भौगोलिक स्थिति, जलभराव की संभावना और मिट्टी की गुणवत्ता को समझना सबसे अहम है।

सही किस्म का चुनाव है जरूरी

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसान अपनी जमीन और समय के अनुसार ही सोयाबीन की किस्म का चयन करें। यदि आप जल्दी कटाई वाली किस्में चुनना चाहते हैं, तो निम्नलिखित विकल्प बेहतर हैं:

  • जे.एस.-2034
  • जे.एस.-2029
  • जे.एस.-9560

ये किस्में मात्र 80 से 85 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। वहीं, जो किसान मध्यम अवधि वाली फसल चाहते हैं, उनके लिए जे.एस.-2098 और जे.एस.-2172 बेहतर विकल्प हैं। ये किस्में 90 से 95 दिनों में तैयार होती हैं और 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।

मेढ़-कूंड तकनीक से सुरक्षित होगी फसल

कृषि वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम ने अधिक पैदावार और सुरक्षा के लिए रिज एंड फेरो यानी मेढ़-कूंड पद्धति अपनाने पर जोर दिया है। इस तकनीक में एक विशेष सीड ड्रिल मशीन का उपयोग किया जाता है, जिससे बुआई के समय ही खेत में मेढ़ तैयार हो जाती है। इसके मुख्य लाभ इस प्रकार हैं:

  • अत्यधिक बारिश होने पर जलभराव से पौधों को सुरक्षा मिलती है।
  • पौधों में सड़न और फंगस लगने का खतरा काफी कम हो जाता है।
  • कूंड में जमा पानी सूखे की स्थिति में पौधों को नमी प्रदान करता है।

इस आधुनिक तकनीक को अपनाकर किसान प्रतिकूल मौसम में भी कम लागत में बेहतर पैदावार हासिल कर सकते हैं।

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