सफलता की अनोखी दास्तान
बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले विकास कुमार ने साबित कर दिया है कि इरादे मजबूत हों तो शारीरिक बाधाएं भी छोटी पड़ जाती हैं। दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद विकास ने BPSC (बिहार लोक सेवा आयोग) की कठिन परीक्षा में सफलता का परचम लहराया है। विकास को इस परीक्षा में BDO (प्रखंड विकास पदाधिकारी) का पद मिला है। उनकी यह उपलब्धि इस मायने में भी खास है क्योंकि उन्हें यह सुखद समाचार ठीक उसी दिन मिला, जब उनके घर में उनकी शादी की मेहंदी की रस्म चल रही थी।
पिता का सहारा और बचपन का संघर्ष
विकास कुमार जिला मुख्यालय से 6 किमी दूर स्थित डेढ़सैया गांव के निवासी हैं। उन्होंने बताया कि भले ही वे शारीरिक रूप से अक्षम रहे हों, लेकिन उनके परिवार और समाज ने उन्हें कभी इस बात का एहसास नहीं होने दिया। विकास की शुरुआती पढ़ाई गांव के पास के ही एक स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने IIT की तैयारी के लिए पटना का रुख किया। इस सफर में उनके पिता का योगदान अतुलनीय रहा, जो उन्हें हर दिन साइकिल पर बैठाकर कोचिंग तक छोड़ने और लाने का काम करते थे।
दो बार की असफलता के बाद मिली कामयाबी
पटना उच्च न्यायालय में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर के पद पर कार्यरत रहते हुए विकास अपनी सिविल सेवा की तैयारी में जुटे थे। उन्होंने हार नहीं मानी और निरंतर प्रयास करते रहे। विकास बताते हैं कि वे इससे पहले 2 बार इंटरव्यू राउंड तक पहुंचे थे, लेकिन वहां सफलता नहीं मिल सकी। हालांकि, इस बार उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से लक्ष्य हासिल कर ही लिया। उन्होंने अपने संघर्ष को साझा करते हुए बताया कि पटना उच्च न्यायालय में नौकरी लगने के महज 22वें दिन ही उनकी माता का देहांत हो गया था, जो उनके लिए एक बहुत बड़ी क्षति थी।
परिवार और समाज का नजरिया
विकास के पिता राम उदय शर्मा का मानना है कि यह उपलब्धि पूरी तरह से उनके बेटे की मेहनत का परिणाम है। वहीं उनके चाचा मुकेश कुमार ने बताया कि विकास बचपन से ही पढ़ाई और खेलकूद में बहुत मेधावी रहा है। परिवार ने उसे हमेशा एक सामान्य बच्चे की तरह ही पाला, जिसका सकारात्मक प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर पड़ा। आज विकास न केवल अपने परिवार का नाम रोशन कर रहे हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक मिसाल और प्रेरणा बन गए हैं।
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