सीबीआई का शिकंजा और गिरफ्तारी
हरियाणा और चंडीगढ़ में आईडीएफसी और एयू स्मॉल बैंक के माध्यम से हुए 600 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले में सीबीआई ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के डेटा एंट्री ऑपरेटर सौरव शर्मा को गिरफ्तार कर लिया है। आरोपी को पंचकूला की सीबीआई विशेष अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उसे चार दिन की रिमांड पर भेज दिया गया है। इस पूरे मामले में पहले ही आरके सिंह और पंकज अग्रवाल जैसे आईएएस अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
घोटाले की कार्यप्रणाली और सरकारी नियमों का उल्लंघन
सीबीआई के अनुसार, आरोपी सौरव शर्मा बोर्ड में डेटा एंट्री ऑपरेटर के पद पर तैनात था और उसे वित्त विभाग के सरकारी धन निवेश संबंधी नियमों की पूरी जानकारी थी। जांच में पाया गया कि उसने नियमों को ताक पर रखकर निजी बैंकों को अनुचित लाभ पहुंचाया। दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में सरकारी धन जमा करने की सीमा केवल 50 करोड़ रुपये थी, जिसे आरोपी की मिलीभगत से बढ़ाया गया:
- मार्च 2025 में निवेश राशि 67.9 करोड़ रुपये तक पहुंची।
- जून 2025 में यह आंकड़ा 105.68 करोड़ रुपये हो गया।
- अक्टूबर 2025 तक निवेश राशि 113.68 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गई।
शेल कंपनियों के जरिए सरकारी धन की लूट
एजेंसी ने अदालत को बताया कि 13 मार्च 2025 से 13 फरवरी 2026 के बीच सरकारी खाते से कई संदिग्ध डेबिट ट्रांजेक्शन किए गए। इन लेनदेन के माध्यम से करीब 187.26 करोड़ रुपये विभिन्न शेल कंपनियों में ट्रांसफर किए गए। सीबीआई के दावों के मुताबिक, तमाम क्रेडिट एंट्री के बावजूद सरकारी खाते को कुल 169.35 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा है।
गोपनीय जानकारी लीक करने और सबूत नष्ट करने का आरोप
सीबीआई का आरोप है कि सौरव शर्मा निजी बैंकों के प्रतिनिधियों के सीधे संपर्क में था। वह उन्हें सरकारी फाइल, ब्याज दरों और फंड मैच्योरिटी से जुड़ी संवेदनशील और गोपनीय जानकारियां साझा करता था, ताकि निजी बैंक अपने प्रस्ताव उसी हिसाब से तैयार कर सकें। इसके अलावा, आरोपी पर डिजिटल साक्ष्य मिटाने का भी आरोप है। जांच के दौरान जब उसका मोबाइल फोन जब्त किया गया, तो उसमें कई महत्वपूर्ण चैट और रिकॉर्ड गायब मिले, जिन्हें आरोपी ने डिलीट कर दिया था।
रिमांड की मुख्य वजह
सीबीआई ने अदालत से रिमांड की मांग करते हुए तर्क दिया कि आरोपी से पूछताछ अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि उसे निम्नलिखित तथ्यों का पता लगाना है:
- डिलीट किए गए डेटा, पासवर्ड और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को रिकवर करना।
- सरकारी धन के गबन के पूरे नेटवर्क और उससे खरीदी गई संपत्तियों का पता लगाना।
- इस घोटाले में शामिल अन्य अधिकारियों और निजी व्यक्तियों की भूमिका को उजागर करना।
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