चीन को हथियारों की बिक्री का विवाद
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन में तैनात अमेरिकी राजदूत डेविड पर्ड्यू के बीच विरोधाभासी बयानों ने वैश्विक स्तर पर हड़कंप मचा दिया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान कुछ ऐसे दावे सामने आए, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी। राजदूत डेविड पर्ड्यू ने एक अमेरिकी टेलीविजन कार्यक्रम के दौरान दावा किया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बातचीत में उनसे यह पूछा था कि क्या चीन अमेरिका से हथियार खरीदने में रुचि रखता है। इस खुलासे के बाद दुनिया भर में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या अमेरिका अपनी दशकों पुरानी विदेश नीति में बदलाव करने जा रहा है।
ट्रंप ने खारिज किया राजदूत का दावा
बवाल बढ़ने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। जब इस विषय पर पत्रकारों ने उनसे सवाल किए, तो उन्होंने इसे सिरे से नकारते हुए कहा कि उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं सुनी है और इस बारे में डेविड पर्ड्यू से ही सवाल पूछना पड़ेगा। ट्रंप ने उलटा सवाल करते हुए कहा कि क्या पत्रकारों का आशय ताइवान से है। हालांकि, बाद में ट्रंप ने यह जरूर जोड़ा कि अमेरिकी हथियार दुनिया में सबसे बेहतर हैं और हो सकता है कि चीन भविष्य में उन्हें खरीदने का इच्छुक हो, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि शी जिनपिंग के साथ ऐसी किसी भी बिक्री को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई थी। ट्रंप ने इसे केवल एक काल्पनिक विचार के तौर पर पेश किया।
अमेरिकी विदेश विभाग की सफाई
इस पूरे मामले पर अमेरिकी विदेश विभाग ने भी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए डेविड पर्ड्यू के बयान से पूरी तरह दूरी बना ली है। विभाग ने आधिकारिक तौर पर कहा कि अमेरिकी कानून के तहत चीन को हथियार बेचना संभव नहीं है। साथ ही, विभाग ने इस बात पर जोर दिया कि चीन को सैन्य उपकरण बेचने की न तो कोई योजना है और न ही इस तरह का कोई प्रस्ताव विचाराधीन है। अगर अमेरिका वाकई ऐसी किसी नीति पर काम करता, तो यह उसकी दशकों पुरानी सुरक्षा नीति में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित बदलाव होता। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने आखिरी बार 1980 के दशक में चीन के साथ हथियारों का व्यापार किया था। वर्तमान में दोनों देशों के बीच जो सैन्य और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा चल रही है, उसे देखते हुए हथियारों की ऐसी बिक्री को असंभव माना जा रहा है।
चीन की प्रतिक्रिया और खामोशी
इस विवादास्पद बयान के बाद चीन की प्रतिक्रिया बेहद सधी हुई रही। समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार, चीनी विदेश मंत्रालय ने डेविड पर्ड्यू के दावे की पुष्टि नहीं की। चीन ने बस इतना कहा कि वह अपनी सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी रक्षा क्षमता को मजबूत करना जारी रखेगा और वैश्विक शांति बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ड्रैगन की यह चुप्पी इस बात का संकेत है कि बीजिंग फिलहाल इस कूटनीतिक विवाद में फंसकर अपने संबंधों को और अधिक खराब नहीं करना चाहता।
ताइवान और अमेरिका का कूटनीतिक समीकरण
इस पूरे विवाद के केंद्र में ताइवान को हथियारों की आपूर्ति का मुद्दा भी शामिल है। राजदूत पर्ड्यू के बयानों से ऐसा आभास हुआ कि ट्रंप प्रशासन ताइवान को हथियारों की बिक्री को भी एक व्यापारिक समझौते की तरह देख सकता है। अमेरिका का कानून लंबे समय से ताइवान को अपनी रक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराने का समर्थन करता रहा है। दूसरी ओर, चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और अमेरिका से यह मांग करता रहा है कि वह ताइवान को हथियारों की आपूर्ति बंद करे। शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के दौरान भी ताइवान का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। बहरहाल, ट्रंप के हालिया इनकार के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका चीन के साथ हथियारों का सौदा करने की स्थिति में नहीं है, लेकिन इस घटना ने ताइवान और चीन को लेकर अमेरिकी प्रशासन की नीतियों पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।
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