राजनीति के एक बड़े और विवादास्पद अध्याय का नाम
विश्वनाथ प्रताप सिंह, जिन्हें वीपी सिंह के नाम से जाना जाता है, भारत के 7वें प्रधानमंत्री रहे। अपने महज 11 महीने के कार्यकाल में उन्होंने जो फैसले लिए, उनसे भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल गई। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कांग्रेस जैसे विशाल दल को चुनौती दी और देश में सामाजिक न्याय की एक नई लहर पैदा की।
साहसी निर्णयों के केंद्र में वीपी सिंह
वीपी सिंह को भारतीय राजनीति में दुस्साहसी फैसलों का राजा माना जाता है। उन्होंने राजीव गांधी सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए कर चोरी के खिलाफ अभियान छेड़ा। बाद में रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने पनडुब्बी खरीद सौदे में कथित कमीशनखोरी की जांच के आदेश दिए, जो उस समय के किसी भी मंत्री के लिए एक असामान्य कदम था। अंततः उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर अलग राह चुनी और विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों को साथ लेकर राष्ट्रीय मोर्चा बनाया, जिसकी मदद से उन्होंने केंद्र में सरकार बनाई।
गृहमंत्री का पद और कश्मीर का संकट
वीपी सिंह का एक और चौंकाने वाला फैसला मुफ्ती मोहम्मद सईद को देश का गृहमंत्री बनाना था। यह भारतीय इतिहास में पहली बार था जब किसी मुस्लिम नेता को यह महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा गया। इसका उद्देश्य कश्मीरी समाज को मुख्यधारा में जोड़ना था, लेकिन डॉ. रूबैया सईद के अपहरण और आतंकियों की रिहाई के बाद कश्मीर घाटी में आतंकवाद का एक भयानक दौर शुरू हो गया।
मंडल की राजनीति और सरकार का पतन
अगस्त 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू कर दिया, जिससे अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का रास्ता खुल गया। इस फैसले ने देश में मंडल और कमंडल की राजनीति को जन्म दिया। भाजपा द्वारा राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को उठाने और समर्थन वापस लेने के कारण उनकी सरकार 11 महीने में ही गिर गई। हालांकि, आरक्षण का लाभ पाने वाली पीढ़ी के बीच वे कभी उस नायक का दर्जा नहीं पा सके, जिसकी अपेक्षा की गई थी।
ईमानदारी और अज्ञातवास
वीपी सिंह की छवि एक बेहद ईमानदार और आदर्शवादी नेता की थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए फूलन देवी गैंग द्वारा की गई हत्याओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। 1996 में जब गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपाई दलों ने उन्हें दोबारा प्रधानमंत्री बनाना चाहा, तो उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। वे नेताओं के दबाव से बचने के लिए कई घंटों तक अज्ञातवास में रहे और तभी सामने आए जब एचडी देवेगौड़ा के नाम पर सहमति बनी।
अंतिम दिन
अपने जीवन के अंतिम दस साल उन्होंने कैंसर और डायलिसिस की बीमारियों के साथ बिताए। इस दौरान वे पेंटिंग्स और कविताओं में व्यस्त रहे। 27 नवंबर 2008 को उनका निधन हुआ। यह दुखद संयोग था कि उनके निधन की खबर मुंबई हमलों की खबरों के बीच मुख्य सुर्खियों से दूर रह गई।
https://hindi.news18.com/news/nation/ex-pm-vp-singh-birth-anniversary-first-and-last-muslim-home-minister-obc-reservation-relation-with-rajiv-gandhi-10600940.html