न्यायालय का सख्त रुख
इंदौर हाईकोर्ट ने धर्म छुपाकर शादी करने के मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर शादी करता है और उस रिश्ते से संतान होती है, तो वह महिला और बच्चे को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि शादी की वैधता पर सवाल उठाकर महिला और बच्चे के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला सामने आने के बाद इंदौर फैमिली कोर्ट ने वर्ष 2023 में महिला की याचिका को खारिज कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने तर्क दिया था कि महिला कानूनी रूप से पत्नी की श्रेणी में नहीं आती है। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की एकलपीठ ने इस आदेश को पलटते हुए कहा कि धोखे का शिकार हुई महिला को आर्थिक और कानूनी सुरक्षा प्रदान करना न्याय प्रणाली का कर्तव्य है।
कुल 20 हजार रुपये का मासिक भुगतान
अदालत ने पति को आदेश दिया है कि वह अपनी पत्नी और बेटी के भरण-पोषण के लिए प्रत्येक को 10-10 हजार रुपये यानी कुल 20 हजार रुपये प्रति माह का भुगतान करे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह राशि उसी दिन से प्रभावी मानी जाएगी जिस दिन से महिला ने भरण-पोषण के लिए कानूनी याचिका दायर की थी। इसका मतलब यह है कि पति को पिछली अवधि का पूरा बकाया भुगतान भी करना होगा।
न्याय की दिशा में कदम
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह फैसला उन महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत है जो शादी के नाम पर धोखे और गलत जानकारी का शिकार बनी हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ऐसी परिस्थितियों में महिला को भरण-पोषण न देना उसके साथ दोबारा अन्याय करने के समान है। न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से संदेश दिया है कि बच्चों और महिलाओं के हितों की रक्षा करना सर्वोच्च प्राथमिकता है और उन्हें किसी भी स्थिति में आर्थिक सहायता से वंचित नहीं रखा जा सकता है।
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