गौरवशाली इतिहास की नींव
अमेठी की धरती पर स्थित कोहरा रियासत केवल एक राजपाठ की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय स्वाभिमान और विदेशी सत्ता के विरुद्ध हुए संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस रियासत की जड़ें मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नरवरगढ़ से जुड़ी हैं। नरवरगढ़ के राजकुमार सोढ़ देव ने सन 966 ईस्वी में अमेठी राज्य की नींव रखी थी। इसी वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अमेठी के राजा विक्रम साह के छोटे पुत्र राजकुमार हिम्मत साह ने ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा के पावन पर्व पर, सन 1636 ईस्वी में कोहरा रियासत की स्थापना की थी।
1857 की क्रांति और बाबू भूप सिंह का शौर्य
ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कोहरा रियासत आजादी के दीवानों के लिए एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरी। सन 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कोहरा के शासक बाबू भूप सिंह ने क्रांति में अग्रिम भूमिका निभाई। उन्होंने सुल्तानपुर जिले के चांदा और कादूनाला के युद्धों में अंग्रेजी सेना को कड़ी टक्कर दी थी। इतना ही नहीं, उन्होंने लखनऊ रेजीडेंसी के ऐतिहासिक घेराव में भी अपनी सेना का नेतृत्व किया।
बाबू भूप सिंह के इस साहस से बौखलाई ब्रिटिश सरकार ने दमनकारी नीतियां अपनाईं। रियासत पर भारी कर थोपे गए और अंततः अंग्रेजी सैनिकों ने कोहरा किले को ध्वस्त करने का आदेश दिया। आज भी उस किले के अवशेष उस दौर के संघर्ष और बलिदान की गवाही देते हैं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोहरा रियासत को पुनः अधिकार प्राप्त हुए थे।
चतुर्भुज धाम: आस्था और रणनीति का केंद्र
राजकुमार हिम्मत साह ने कोहरा में भगवान विष्णु के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज चतुर्भुज धाम के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं था, बल्कि यहाँ रियासत के तालुकदार एकत्र होकर आजादी की लड़ाई और भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा करते थे।
पीढ़ियों का योगदान और वर्तमान स्थिति
इस रियासत को समय-समय पर अनेक प्रतापी शासकों और तालुकदारों का संरक्षण मिला। इनमें बाबू शिव दयाल सिंह, बाबू देवी दयाल सिंह, बाबू महावीर सिंह, बाबू बेनी बहादुर सिंह, बाबू प्रताप बहादुर सिंह, बाबू शिव बहादुर सिंह और बाबू उमानाथ सिंह जैसे नाम शामिल हैं। विशेष रूप से बाबू उमानाथ सिंह ने, जो अवध विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर थे, शिक्षा और इतिहास के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्तमान में इस रियासत की बागडोर संरक्षक बाबू राघवेंद्र प्रताप सिंह (अभय सिंह) के हाथों में है, जो इस गौरवशाली परंपरा को संजोए हुए हैं।
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