ईरान-अमेरिका युद्ध: होर्मुज संकट ने खोल दी चीन के विकास मॉडल की पोल

ईरान और अमेरिका के बीच हुए 60 दिनों के युद्धविराम से ऊर्जा बाजार को भले ही राहत मिली हो, लेकिन इसने चीन की अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरी उजागर कर दी है। होर्मुज स्ट्रेट पर अत्यधिक निर्भरता चीन के निर्यात-आधारित औद्योगिक मॉडल के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो रही है।

ऊर्जा सुरक्षा पर चीन का जोखिम

ईरान और अमेरिका के बीच 60 दिनों के युद्धविराम ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को फिलहाल स्थिरता दी है, लेकिन इस घटनाक्रम ने चीन की एक ऐसी आर्थिक कमजोरी को बेनकाब किया है, जिस पर वैश्विक स्तर पर अब तक कम ध्यान दिया गया था। वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक CSIS की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यदि होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय के लिए बंद हो जाता, तो इसका सबसे भयानक आर्थिक परिणाम चीन को भुगतना पड़ता। चीन का पूरा औद्योगिक ढांचा सस्ती और लगातार मिलने वाली ऊर्जा पर टिका है, जिसके लिए वह होर्मुज जलमार्ग का अत्यधिक उपयोग करता है।

होर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना महत्वपूर्ण

चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल और LNG आयातक देश है। चीन के आयातित कच्चे तेल का लगभग 50 प्रतिशत और कुल तेल आपूर्ति का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के जरिए आता है। इसके अतिरिक्त, चीन की कुल आयातित प्राकृतिक गैस का 30 प्रतिशत भी इसी रास्ते से आता है। यदि इस समुद्री रास्ते पर नाकेबंदी होती है, तो चीन के परिवहन, पेट्रोकेमिकल और विनिर्माण उद्योगों पर गहरा असर पड़ेगा, जो उसकी आर्थिक प्रगति के मुख्य स्तंभ हैं।

ग्रीन एनर्जी का विरोधाभास

चीन इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी और सौर ऊर्जा उपकरणों के उत्पादन में विश्व में अग्रणी है, लेकिन उसका औद्योगिक आधार अभी भी काफी हद तक पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर है। भले ही बिजली उत्पादन में तेल का उपयोग कम हो गया हो, लेकिन रसायन उद्योग, माल ढुलाई और फैक्ट्रियां अभी भी तेल आधारित ऊर्जा का ही उपयोग करती हैं। यही कारण है कि चीन की हरित ऊर्जा में बढ़त भी उसे पूरी तरह से तेल संकट से बचाने में सक्षम नहीं है।

संकट से निपटने की तैयारी

ईरान संकट के समय चीन के लिए उसका रणनीतिक तेल भंडार सबसे बड़ी ताकत रहा। अनुमान के अनुसार, चीन के पास 1.2 से 1.4 अरब बैरल का भंडार है, जिससे वह लगभग चार महीने तक अपनी जरूरतों को पूरा कर सकता है। संकट के दौरान चीन ने अपने भंडारों का सीमित उपयोग करते हुए रिफाइनरी उत्पादन में कटौती और खपत को नियंत्रित करने की रणनीति अपनाई। वर्तमान में, चीन की प्राथमिक ऊर्जा जरूरतों का 56 प्रतिशत कोयले से आता है, जबकि बिजली उत्पादन का 58 प्रतिशत हिस्सा भी कोयले पर ही निर्भर है।

व्यापार के लिए बढ़ता खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के लिए केवल तेल का महंगा होना ही एकमात्र समस्या नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार में संभावित गिरावट सबसे बड़ा जोखिम है। चीन की अर्थव्यवस्था पहले से ही घरेलू मांग में सुस्ती और रियल एस्टेट सेक्टर की समस्याओं से जूझ रही है। यदि ईरान-अमेरिका संघर्ष के चलते वैश्विक बाजार की गतिविधियां धीमी पड़ती हैं, तो चीन के निर्यात में भारी गिरावट आएगी, जिसका सीधा असर वहां के रोजगार और जीडीपी पर पड़ेगा।

भारत बनाम चीन

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। रूस से रियायती दर पर तेल आयात करने के कारण भारत की होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भरता 2022 में 50 प्रतिशत से घटकर अब करीब 40 प्रतिशत रह गई है। इसके विपरीत, चीन के पास विकल्प तो हैं, लेकिन उसकी औद्योगिक मशीनरी को चलाने के लिए प्रतिदिन बड़ी मात्रा में तेल की आवश्यकता होती है, जिससे उसकी संवेदनशीलता अधिक बनी हुई है।

भविष्य का सबक

बीजिंग के लिए यह संकट एक बड़ी चेतावनी है। भविष्य में चीन रणनीतिक तेल भंडार बढ़ाने, रूस और मध्य एशिया से पाइपलाइन के जरिए आपूर्ति मजबूत करने और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को और तेज करने पर ध्यान केंद्रित करेगा। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन एनर्जी निर्माता होने के बावजूद चीन का औद्योगिक तंत्र पश्चिम एशिया के तेल पर काफी हद तक निर्भर है, जो आज बीजिंग की सबसे बड़ी चुनौती है।

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