इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निषाद और केवट जैसी जातियों को SC में शामिल करने की मांग खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने निषाद, केवट और मल्लाह सहित अन्य समुदायों को अनुसूचित जाति में जोड़ने की मांग वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जातियों की सूची में बदलाव का अधिकार केवल संसद के पास है।

संसद ही ले सकती है अंतिम निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान निषाद, कश्यप, केवट, मल्लाह और बिंद समुदायों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि किसी भी जाति को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करना या उससे हटाना पूरी तरह से संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय इस प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

क्या थी याचिका की मुख्य मांग

यह मामला साल 2012 में चंद्रशेखर निषाद द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का तर्क था कि निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद समुदाय असल में अनुसूचित जाति में दर्ज मजहवार जाति के ही पर्यायवाची या उप-समूह हैं। इस आधार पर उन्होंने मांग की थी कि इन समुदायों को अनुसूचित जाति में शामिल करते हुए सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ दिया जाए। याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में 1961 की जनगणना पुस्तिका और अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया था।

राज्य सरकार का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने पुरजोर विरोध करते हुए तर्क दिया कि उत्तर प्रदेश में ये सभी जातियां वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के अंतर्गत मान्यता प्राप्त हैं। सरकार ने स्पष्ट किया कि इन्हें अनुसूचित जाति घोषित करने का कानूनी अधिकार केवल संसद के पास सुरक्षित है।

कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों, विशेषकर स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम मिलिंद मामले का उल्लेख किया। न्यायालय ने अपने फैसले में निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:

  • राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित अनुसूचित जातियों की सूची में किसी भी प्रकार का बदलाव करना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।
  • केवल समानता या पर्यायवाची होने के दावे पर किसी जाति को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
  • याचिका में कोई ठोस कानूनी आधार न होने के कारण इसे गुणहीन मानकर खारिज किया जाता है।

इस फैसले के साथ ही कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि संवैधानिक प्रक्रिया के बिना इन समुदायों की श्रेणी में बदलाव संभव नहीं है।

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