ईरान संकट के दौरान कैसे सुरक्षित रहा भारत, मोदी सरकार की रणनीति ने कैसे बचाई अर्थव्यवस्था

जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के चलते वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहराया, तब भारत ने अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक सूझबूझ से खुद को बड़े आर्थिक नुकसान से बचा लिया।

ऊर्जा क्षेत्र में भारत का प्रदर्शन

अमेरिका और ईरान के बीच जब युद्ध जैसे हालात बने थे, तो पूरी दुनिया तेल और गैस की किल्लत से जूझ रही थी। इस वैश्विक संकट के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर बेहद सीमित रहा। एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी की हालिया रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि मोदी सरकार ने समय रहते जो रणनीतिक कदम उठाए, उन्होंने भारत को एक बड़े आर्थिक जोखिम से बचा लिया।

आपूर्ति के स्रोतों का विविधीकरण

विशेषज्ञों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक एलएनजी आपूर्ति में करीब 17 फीसदी की बड़ी बाधा आई थी। हालांकि, दुनिया के चौथे सबसे बड़े एलएनजी खरीदार के तौर पर भारत ने बड़ी चतुराई दिखाई। भारत ने ओमान, अमेरिका, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों के साथ अपने आपूर्ति स्रोतों का विस्तार किया। इस कदम का असर यह हुआ कि भारत के एलएनजी आयात पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा और अप्रैल तथा मई 2026 में इसमें सालाना आधार पर क्रमशः महज 5 फीसदी और 2 फीसदी की ही गिरावट दर्ज की गई।

रणनीतिक भंडार और भविष्य की तैयारी

एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के अनुसार, भारत ने कच्चे तेल की खरीद में भी रूस के अलावा वेनेजुएला और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भरता बढ़ाकर खुद को मजबूती दी है। संस्था के प्रधान शोध विश्लेषक जोहान उतामा के अनुसार, भविष्य की किसी भी अनिश्चितता को कम करने के लिए भारत अपनी एलएनजी खरीद की इन रणनीतियों को आगे भी जारी रखेगा, जो लंबी अवधि के लिए काफी सकारात्मक साबित हो सकती हैं।

इतिहास की सबसे बड़ी तेल बाधा

एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के उपाध्यक्ष जिम बुरखर्द का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का बंद होना तेल आपूर्ति के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी बाधा रही है। इस संकट के दौरान खाड़ी क्षेत्र में तरल ईंधन उत्पादन में प्रतिदिन 1.5 करोड़ बैरल की कमी दर्ज की गई। भारत की सफलता का मुख्य आधार अपनी आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाना, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार खुद को तेजी से ढालना रहा है।

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