ट्रंप प्रशासन के फैसले पर कोर्ट की मुहर
अमेरिका में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को कानूनी मोर्चे पर हार का सामना करना पड़ा है। संघीय अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सरकारी डेटाबेस के उपयोग पर रोक लगा दी है। यह पूरा विवाद मार्च, 2025 में जारी किए गए उस कार्यकारी आदेश से जुड़ा है, जिसमें संघीय चुनावों के दौरान मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देना अनिवार्य कर दिया गया था।
गोपनीयता और अधिकारों का मामला
जज स्पार्कल सूकानन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सरकार ने जिस तरह से नागरिकों की संवेदनशील जानकारी का उपयोग किया, वह उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए खतरा पैदा कर सकता है। कोर्ट का मानना है कि संघीय एजेंसियों ने चुनावी बदलावों को लागू करने की जल्दबाजी में लाखों नागरिकों के निजी डेटा को न केवल इकट्ठा किया, बल्कि उसका दोबारा उपयोग भी किया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जब बात नागरिकों की निजता और उनके मताधिकार की हो, तो न्यायपालिका मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।
गलत जानकारी से मतदाता सूची प्रभावित होने का डर
अदालत के मुताबिक, इस डेटाबेस के इस्तेमाल से कई राज्यों ने गलत या अधूरी जानकारी के आधार पर योग्य नागरिकों को मतदाता सूची से हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी थी। इस मामले की शुरुआत सितंबर 2025 में दायर एक मुकदमे से हुई, जिसे लीग ऑफ वीमेन वोटर्स समेत कई संगठनों ने मिलकर दाखिल किया था। याचिका में SAVE यानी सिस्टेमैटिक एलियन वेरिफिकेशन फॉर एंटाइटलमेंट्स प्रणाली में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई थी।
आगे की स्थिति
लीग ऑफ वीमेन वोटर्स ने अदालत के इस रुख का स्वागत किया है। संगठन का कहना है कि सरकार की इस कवायद के कारण लाखों लोगों को अनावश्यक जांच और मतदाता सूची से गलत तरीके से बाहर किए जाने का खतरा पैदा हो गया था। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह कदम चुनावी पारदर्शिता के लिए जरूरी है, लेकिन अदालत ने डेटा सुरक्षा और नागरिक अधिकारों को सर्वोपरि मानते हुए प्रशासन की योजनाओं पर फिलहाल रोक लगा दी है। इसे अमेरिका में मतदान अधिकारों और निजता की सुरक्षा के लिए एक बड़ी कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
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