डिजिटल युग में नेटवर्क का सूखा
देश भर में जहां 5G इंटरनेट और डिजिटल इंडिया का जोर है, वहीं मध्य प्रदेश के मैहर जिले का मनौरा गांव आज भी बुनियादी कनेक्टिविटी के लिए तरस रहा है। जिला मुख्यालय से केवल 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भमरहा पंचायत के इस गांव में सड़क और अन्य सुविधाएं तो पहुंच गई हैं, लेकिन मोबाइल फोन केवल एक डिब्बे के समान बनकर रह गए हैं।
घर से 2 किलोमीटर दूर जाकर होती है बात
गांव में लगभग 150 पक्के और कच्चे मकान हैं और यहां कुल 400 मतदाता रहते हैं। हालांकि गांव में पानी की टंकी और पक्की सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन मोबाइल सिग्नल न होने से ग्रामीणों की जिंदगी प्रभावित हो रही है। गांव के निवासी मुरारी यादव का कहना है कि वे पिछले 35 साल से इसी समस्या का सामना कर रहे हैं। गांव की नई पीढ़ी और घर में आई बहुओं के लिए अपने मायके या रिश्तेदारों से बात करने हेतु 2 किलोमीटर दूर खेतों की मेढ़ या ऊंचे टीलों पर जाना एक बड़ी मजबूरी और शर्मिंदगी का विषय बन गया है।
आपातकाल में जान का जोखिम
नेटवर्क न होने की यह समस्या केवल सामान्य बातचीत तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, अगर रात के समय किसी की तबीयत बिगड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की आवश्यकता पड़े, तो एंबुलेंस को सूचना देना भी एक चुनौती बन जाता है। ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति को नेटवर्क खोजने के लिए अंधेरे में मीलों दूर जाना पड़ता है। विशेष रूप से बारिश के मौसम में कीचड़ और अंधेरे के बीच खेतों में जाना ग्रामीणों के लिए काफी जोखिम भरा होता है।
प्रशासन से टावर लगाने की गुहार
आज के दौर में शिक्षा, बैंकिंग और रोजगार जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं मोबाइल नेटवर्क पर निर्भर हैं। नेटवर्क के अभाव में गांव के बच्चों और युवाओं का भविष्य भी प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों ने अब जिला प्रशासन और बड़ी टेलीकॉम कंपनियों से मांग की है कि जल्द से जल्द मनौरा गांव में मोबाइल टावर स्थापित किया जाए। ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस पहल से उन्हें वर्षों पुरानी इस समस्या से आजादी मिलेगी और उनका गांव भी डिजिटल मुख्यधारा से जुड़ सकेगा।
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