कम बारिश वाले इलाकों में अपनाएं धान की सीधी बुवाई, बचेगा पैसा, समय और मेहनत

धान की सीधी बुवाई (डीएसआर) विधि कम बारिश वाले इलाकों के किसानों के लिए फायदेमंद मानी जा रही है, इसमें पारंपरिक रोपनी की तुलना में लागत 40 फीसदी कम आती है और 30% तक पानी की बचत होती है।

धान की खेती में पारंपरिक रोपनी का तरीका छोड़कर सीधी बुवाई अपनाना अक्सर जोखिम भरा माना जाता है, लेकिन यही तकनीक अब कम बारिश वाले और सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। बिहार के ऐसे क्षेत्रों में डीएसआर विधि से धान की सीधी बुआई को बेहद लाभदायक बताया जा रहा है, क्योंकि इसमें परंपरागत बिचड़े से रोपनी वाली खेती की तुलना में लागत 40 फीसदी तक कम पड़ती है।

क्या है धान की सीधी बुवाई

सीधी बुवाई एक ऐसी विधि है जिसमें धान के बीज को नर्सरी में पौधे तैयार किए बिना ही सीधे खेत में बोया जाता है। यह तरीका पारंपरिक रोपाई से पूरी तरह अलग है। इसमें बीज या तो ड्रिल मशीन से बोए जाते हैं या फिर अंकुरित बीजों को ड्रम सीडर की मदद से खेत में डाला जाता है। इस विधि में खरपतवार पर नियंत्रण और खेत में नमी का प्रबंधन सबसे अहम होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि किसानों को रोपाई में लगने वाले खर्च, समय और मेहनत — तीनों की एक साथ बचत हो जाती है।

लागत में कैसे आती है कमी

डीएसआर विधि से खेती करने पर खाद, मजदूरी, कीटनाशक से लेकर पानी की खपत तक सब कुछ घट जाता है। जीरो टिलेज से सीधी बुआई करने पर खाद भी बर्बाद नहीं होती, क्योंकि वह सीधे धान के बीज के पास ही रहती है। इसके उलट हाथ से छींटने पर खाद उन जगहों पर भी गिरती है जहां बीज होता ही नहीं। सीधी बुआई में धान के बीज को फर्टिलाइजर के साथ जीरो टिलेज मशीन से एक साथ खेत में डाला जाता है। ऐसे में पानी कम होने पर भी कोई दिक्कत नहीं आती और पैदावार भी अच्छी होती है।

कम बारिश वाले इलाकों के लिए कारगर

कम बारिश वाले गया जिले में यह विधि बेहद उपयोगी साबित हो रही है। मानपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र की वैज्ञानिक डॉक्टर रश्मि प्रियदर्शी बताती हैं कि किसान धान के सभी प्रभेद की बुवाई इस विधि से कर सकते हैं। उनके मुताबिक, जो किसान बारिश पर निर्भर रहकर खेती करते हैं, उनके लिए यह तकनीक खासतौर पर फायदेमंद है।

अधिकांश किसान धान का बिचड़ा तैयार करने के लिए बारिश का इंतजार करते हैं, लेकिन किसी कारणवश समय पर बारिश न होने पर उनकी नर्सरी भी सही समय पर तैयार नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में किसान इस विधि को अपनाकर कम लागत में धान की बंपर पैदावार ले सकते हैं।

पानी और लागत दोनों की बचत

इस तकनीक से धान की खेती करने पर किसानों को समय के साथ-साथ लेबर चार्ज की बचत होती है, बीज की भी बचत होती है और 30% तक पानी की बचत हो जाती है। यही वजह है कि कम बारिश वाले क्षेत्रों में इस विधि को तेजी से अपनाने की सलाह दी जा रही है।

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