ममता के हाथ से फिसलती तृणमूल कांग्रेस
पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के अंदर पनपा असंतोष अब एक बड़े राजनीतिक भूचाल की शक्ल ले रहा है। विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के ठीक एक महीने बाद पार्टी के भीतर की नाराजगी खुलकर बाहर आ चुकी है। ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले धड़े का दावा है कि दो-तिहाई से अधिक विधायक उनके पाले में हैं और विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) के तौर पर मान्यता भी प्रदान कर दी है।
ऋतब्रत खेमे का दावा- बहुमत हमारे पास
ऋतब्रत बनर्जी का कहना है कि टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 60 से ज्यादा उनके साथ खड़े हैं। उनके मुताबिक तमाम संवैधानिक और विधायी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए विधानसभा में उनके समूह को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिला है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनका गुट "मैं" की नहीं, बल्कि "हम" की राजनीति में भरोसा रखता है।
हालांकि ममता बनर्जी के प्रति आदर जताते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे ममता को पार्टी की "मुख्य सलाहकार" के रूप में देखना चाहते हैं और उनके लंबे अनुभव का फायदा उठाना चाहते हैं।
अभिषेक बनर्जी पर तीखे प्रहार
ऋतब्रत बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जनता और संगठन से उनका रिश्ता अब कमजोर हो चुका है। उन्होंने आरोप मढ़ा कि मुश्किल घड़ी में अभिषेक लोगों के बीच नजर नहीं आए और बाद में अपनी सुरक्षा बढ़वाने के लिए केंद्र सरकार का सहारा मांगा।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी के भीतर सबसे अधिक रोष अभिषेक बनर्जी को लेकर ही दिख रहा है। चर्चा में यह बात भी उभरी कि कई सांसद और विधायक निजी बातचीत में उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
टीएमसी की कानूनी दलील और ताजा टकराव
टीएमसी नेतृत्व का तर्क है कि ऋतब्रत बनर्जी को पहले ही पार्टी से निकाला जा चुका है, लिहाजा वे न तो पार्टी और न ही विधायक दल की कमान संभाल सकते हैं। मगर राजनीतिक जानकारों का कहना है कि महज निष्कासन से विधानसभा की सदस्यता खत्म नहीं होती, और यदि अधिकांश विधायक किसी नेता के पीछे खड़े हों तो हालात बदल सकते हैं।
चर्चा के दौरान फर्जी हस्ताक्षर वाले पत्र का मसला भी सामने आया। आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष और पार्टी पदों को लेकर स्पीकर को भेजे गए एक पत्र में कुछ विधायकों के दस्तखत विवादों के घेरे में पाए गए। इस प्रकरण की पड़ताल सीआईडी कर रही है। ऋतब्रत खेमे का कहना है कि अगर जांच में जालसाजी पुख्ता हो गई तो मामला और संगीन हो सकता है।
संगठन भंग करने का फैसला भी सुर्खियों में
सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में अपनी अलग-अलग समितियों और फ्रंटल संगठनों को तत्काल प्रभाव से भंग करने का निर्णय लिया है। विश्लेषकों की राय है कि यह कदम संगठन पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश हो सकता है, लेकिन इससे पार्टी के भीतर का संकट और गहरा सकता है।
बीजेपी का हमला
भाजपा नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को टीएमसी की आंतरिक नाकामी करार दिया है। उनका आरोप है कि सत्ता में रहते हुए पार्टी भ्रष्टाचार और घोटालों में फंसी रही, जिसका परिणाम चुनावी हार और अब संगठन में टूट के रूप में दिख रहा है।
अदालत और चुनाव आयोग पर नजरें
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले समय में यह मामला अदालत और चुनाव आयोग की चौखट तक पहुंच सकता है। सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि असली टीएमसी किसे माना जाए। यदि विधायकों और सांसदों का बहुमत ऋतब्रत गुट के साथ बना रहा, तो पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी एक नई कानूनी जंग छिड़ सकती है।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी का यह संकट सबसे बड़ी चर्चा का विषय बना हुआ है और हर किसी की निगाहें ममता बनर्जी के अगले कदम पर टिकी हैं।
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