उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी पिछले नौ वर्षों से अपना दबदबा बनाए हुए है। राज्य में लगातार दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक नया कीर्तिमान गढ़ा है। लेकिन इस प्रचंड समर्थन के बावजूद प्रदेश में 60 से अधिक ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जो आज भी पार्टी के लिए दूर की कौड़ी बनी हुई हैं। इनमें से कई सीटों पर तो बीजेपी कभी जीत ही नहीं सकी, जबकि बाकी पर वह दशकों से लगातार हारती आई है। अब पार्टी आलाकमान ने इन्हीं किलों को भेदने के लिए 'मिशन 60' नाम की एक गोपनीय रणनीति तैयार की है और इसके लिए अपने सबसे अनुभवी चेहरों को मैदान में उतार दिया है।
दो ऐतिहासिक जीतें, फिर भी अधूरी रह गई कसक
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने अकेले दम पर 312 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था, और सहयोगियों को मिलाकर यह आंकड़ा 325 तक पहुंच गया था। इसके बाद 2022 के चुनाव में विपक्ष की कड़ी घेरेबंदी के बावजूद बीजेपी गठबंधन ने 403 में से 273 सीटें जीतकर दोबारा सत्ता हासिल की।
हैरानी की बात यह है कि इन दोनों बड़ी लहरों में भी राज्य की करीब 60-61 ऐसी सीटें रहीं, जहां विपक्ष का किला हिलाना पार्टी के लिए संभव नहीं हो सका। इन सीटों पर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का प्रभाव वर्षों से कायम है, और अब बीजेपी इन्हीं कमजोर कड़ियों को मजबूत करने में जुटी है।
विपक्षी अंतर्विरोध और 'मुलायम युग' के नेताओं पर निगाह
इन 60 सीटों को जीतने के लिए पार्टी के रणनीतिकारों ने तीन-स्तरीय योजना बनाई है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक, बीजेपी विपक्षी दलों के भीतर पनप रहे असंतोष और अंतर्विरोध का फायदा उठाना चाहती है। रणनीति के तहत पार्टी समाजवादी पार्टी के उन दिग्गज नेताओं के संपर्क में है, जो कभी मुलायम सिंह यादव के दौर में बेहद प्रभावशाली थे, लेकिन अब अखिलेश यादव के नेतृत्व में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं।
पश्चिमी यूपी में कुछ खास अल्पसंख्यक समुदायों और यादव समाज के बड़े नेताओं के साथ भी पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार लगातार बातचीत कर रहे हैं। माना जा रहा है कि चुनावी मौसम आते ही इनमें से कई चेहरे पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम सकते हैं।
कार्यकर्ताओं को बड़े पद और स्थानीय नेताओं को तरजीह
हारी हुई सीटों पर अपने संगठन को मजबूत करने के लिए पार्टी ने एक नया दांव चला है। इन क्षेत्रों के सक्रिय और जमीनी कार्यकर्ताओं को सरकारी निगमों, आयोगों, विभिन्न बोर्डों और संगठन के नए ढांचों में बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। इसका मकसद स्थानीय जनता तक यह संदेश पहुंचाना है कि भले ही यहां पार्टी का विधायक न हो, फिर भी सरकार इन क्षेत्रों के नेताओं को पूरा सम्मान दे रही है।
वे सीटें जहां अब तक नहीं खुला बीजेपी का खाता
आइए जानते हैं कि प्रदेश की वे प्रमुख विधानसभा सीटें कौन सी हैं, जहां पार्टी जीत के लिए दशकों से तरस रही है और इस बार उन पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है:
- अंबेडकर नगर: अकबरपुर विधानसभा सीट
- आजमगढ़: निजामाबाद, आजमगढ़ सदर, अतरौलिया, मुबारकपुर और गोपालपुर सीटें
- रायबरेली: हरचंदपुर और ऊंचाहार सीट
- कानपुर: सीसामऊ सीट
- प्रतापगढ़: रामपुर खास और कुंडा सीट
- इटावा: जसवंतनगर सीट (सपा का सबसे मजबूत गढ़)
- जौनपुर: मल्हनी सीट (जो पहले रारी के नाम से जानी जाती थी, यहां भी बीजेपी कभी नहीं जीती)
प्रतापगढ़ की हाई-प्रोफाइल कुंडा सीट की बात करें तो यहां साल 1993 के बाद से बीजेपी कभी नहीं जीत सकी। इस सीट से निर्दलीय और अब जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के मुखिया रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं।
जातीय गणित साधने के लिए 'सोशल इंजीनियरिंग' का सहारा
इन सीटों के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए बीजेपी ने अपनी सबसे कारगर रणनीति 'सोशल इंजीनियरिंग' को आगे बढ़ाया है। पार्टी ने इन क्षेत्रों के जातीय समीकरणों का बारीकी से विश्लेषण किया है। जिस सीट पर जिस जाति या समाज के मतदाता सबसे ज्यादा हैं, उसी समाज के किसी प्रभावशाली नेता को उस जिले या क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है।
इसके अलावा, योगी सरकार के लोकप्रिय मंत्रियों और चेहरों के लगातार दौरे और जनसभाएं इन इलाकों में आयोजित की जा रही हैं। साथ ही, केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की योगी सरकार की कल्याणकारी एवं विकास योजनाओं को इन क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जा रहा है और उनका आक्रामक प्रचार भी हो रहा है।
पिछली हार के आंकड़े बताते हैं क्यों कठिन है राह
इन सीटों के पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि बीजेपी के लिए यह रास्ता आसान क्यों नहीं रहा:
- अकबरपुर (अंबेडकर नगर): साल 2017 में बसपा यहां 14,013 वोटों से जीती थी। वहीं 2022 में बीजेपी उम्मीदवार सपा प्रत्याशी से करीब 6% वोटों के अंतर यानी 12,336 वोटों से चुनाव हार गए।
- निजामाबाद (आजमगढ़): इसे सपा का सबसे अभेद्य गढ़ माना जाता है। 2022 में बीजेपी प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन हार का अंतर 34,187 वोटों का था।
- ऊंचाहार (रायबरेली): पिछले चुनाव में सपा के मनोज कुमार पांडेय यहां से 6,621 वोटों से जीते थे। हालांकि अब समीकरण बदल चुके हैं, क्योंकि मनोज पांडेय पाला बदलकर बीजेपी में आ चुके हैं और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं।
- रामपुर खास (प्रतापगढ़): यह कांग्रेस का सबसे मजबूत किला है। यहां से प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' ने पिछले चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को 10,981 वोटों से हराया था।
जमीनी स्तर पर 'बूथ जीतो' का सख्त निर्देश
इस 'मिशन 60' को अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी आलाकमान ने सिर्फ बड़े नेताओं को ही नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं को भी काम पर लगा दिया है। बूथ अध्यक्षों से लेकर मंडल और जिला अध्यक्षों तक को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि वे 'ग्राउंड जीरो' पर ही डटे रहें। उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे स्थानीय जनता के हर सुख-दुख में शामिल हों, ताकि बीजेपी के प्रति लोगों के मन में बनी हिचक को दूर किया जा सके।
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