Vinayak Pradyumna Chaturthi Vrat 2026: ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित मानी जाती है और इसी दिन प्रद्युम्न चतुर्थी का व्रत रखने की परंपरा है। मान्यता है कि इस अवसर पर गणपति की आराधना करने तथा व्रत धारण करने से साधक को पुण्यदायी फल प्राप्त होते हैं। साथ ही इस दिन किया गया दान-पुण्य भी विशेष फलदायी माना गया है। इस वर्ष प्रद्युम्न चतुर्थी का व्रत 18 जून 2026 को रखा जाएगा। आइए जानते हैं इस दिन बनने वाले शुभ योग, पूजा के मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में।
प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत 2026 का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का आरंभ 17 जून को रात 9 बजकर 38 मिनट पर होगा और इसका समापन 18 जून को शाम 6 बजकर 58 मिनट पर होगा। चतुर्थी का मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11 बजकर 20 मिनट से दोपहर 1 बजकर 59 मिनट तक रहेगा। इस दिन वर्जित चंद्र दर्शन का समय 09:19 ए एम से 10:31 पी एम तक रहेगा।
प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत 2026 के शुभ योग
इस बार प्रद्युम्न चतुर्थी पर गुरु पुष्य योग और पुष्य नक्षत्र का उत्तम संयोग बन रहा है। इसके अतिरिक्त इस दिन अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेंगे। अमृत सिद्धि योग 06:01 ए एम से 11:32 ए एम तक रहेगा, जबकि सर्वार्थ सिद्धि योग भी 06:01 ए एम से 11:32 ए एम तक रहेगा। पुष्य नक्षत्र गुरुवार को सुबह 11 बजकर 33 मिनट तक रहेगा और गुरु पुष्य योग सुबह 6 बजकर 1 मिनट से सुबह 11 बजकर 32 मिनट तक बना रहेगा।
प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत पूजन विधि
- व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हों और स्वच्छ वस्त्र धारण करें, इसके बाद व्रत का संकल्प लें।
- मंदिर अथवा पूजा स्थल की सफाई करके वहां गंगाजल छिड़ककर उसे शुद्ध कर लें।
- एक लकड़ी की चौकी लें और उस पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- आसन पर बैठकर पूजन आरंभ करें तथा दूर्वा, शुद्ध जल, पुष्प, लाल चंदन, गंध और नैवेद्य आदि के साथ विधिपूर्वक षोडशोपचार गणेश पूजन करें।
- गणेशजी को लड्डू, मोदक, खीर अथवा पंचमेवा से युक्त नैवेद्य अर्पित करें।
- गणेश स्तोत्र और गणेश चालीसा का पाठ करें, फिर गणेशजी की आरती उतारें तथा मंत्रों का जाप करें।
- अंत में प्रद्युम्न चतुर्थी व्रत कथा का श्रवण अथवा पाठ अवश्य करें।
गणेश जी के मंत्र
- ॐ वक्रतुण्डाय हुम्॥
- ॐ गं गणपतये नमः॥
- श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
- ॐ एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥
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