जैविक खेती से बदली तकदीर
बिहार के सारण जिले के अंतर्गत आने वाले छपरा में आजकल खेती करने का तरीका तेजी से बदल रहा है। यहां के स्थानीय किसान अब पुरानी और पारंपरिक शैली को छोड़कर आधुनिक और वैज्ञानिक जैविक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इस बदलाव के पीछे कृषि विज्ञान केंद्र, मांझी द्वारा दिए गए प्रशिक्षण और सरकार के जैविक खेती अभियान की बड़ी भूमिका है। किसान अब रासायनिक खाद और हानिकारक कीटनाशकों का मोह छोड़कर जहर मुक्त खेती को अपना रहे हैं। इससे न केवल फसल की लागत में भारी कमी आई है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी उल्लेखनीय इजाफा देखने को मिल रहा है।
घर पर तैयार खाद से हो रही बचत
छपरा के सैकड़ों जागरूक किसान अब अपनी खेती की जरूरतें खुद ही पूरी कर रहे हैं। वे बाजार से महंगी खाद खरीदने के बजाय वैज्ञानिक तरीके अपनाकर स्वयं जैविक खाद बना रहे हैं। इसके लिए वे खेतों से निकलने वाले खरपतवार, घास, भूसा और पशुओं के गोबर का उपयोग कर रहे हैं। इसी तकनीक से वे वर्मी कंपोस्ट और प्राकृतिक कीटनाशक तैयार कर रहे हैं, जिससे फसलों की पैदावार में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। रासायनिक खाद की खरीद पर होने वाला भारी खर्च बच रहा है और साथ ही खेतों की जमीन की उपजाऊ शक्ति में भी निरंतर सुधार हो रहा है।
लौकी की खेती बनी आय का जरिया
इस बदलाव के एक प्रमुख उदाहरण किसान सत्यनारायण यादव हैं। उन्होंने अपने एक एकड़ के खेत में 'VNR सरिता' किस्म की लौकी की फसल लगाई है। सत्यनारायण बताते हैं कि यह फसल पिछले एक महीने से लगातार फल दे रही है और यह सिलसिला अगस्त तक जारी रहेगा। वे हर रोज अपने खेत से 100 से भी ज्यादा लौकी तोड़कर बाजार में बेच रहे हैं। इस तरह उन्हें हर दिन नकद कमाई हो रही है, जिसने उनकी खेती को किसी एटीएम मशीन की तरह बना दिया है।
नौकरी से बेहतर है अपनी खेती
सत्यनारायण का मानना है कि घर से बाहर जाकर मजदूरी या अन्य नौकरी करने से कहीं बेहतर है कि अपनी जमीन पर मेहनत की जाए। उनका कहना है कि अगर किसान दिन के मात्र 2 से 4 घंटे भी अपनी नगदी फसलों को दें, तो वे हर महीने आसानी से 25 से 30 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। सत्यनारायण की इस मेहनत और सफलता को देखने के लिए आसपास के गांवों से किसान उनके खेत पर पहुंचते हैं। वे इन आने वाले किसानों को जैविक खेती की बारीकियां बिना किसी शुल्क के सिखाने का काम भी कर रहे हैं।
सरकारी सहयोग की दरकार
किसानों का कहना है कि वे जैविक और प्राकृतिक उत्पादों के लाभ से पूरी तरह वाकिफ हैं। केमिकल वाली सब्जियां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और बीमारियां फैला रही हैं, जबकि ऑर्गेनिक सब्जियां पूरी तरह सुरक्षित हैं। किसानों के अनुसार, सरकार उन्हें जहर मुक्त खेती के प्रति जागरूक तो कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी ठोस व्यवस्था और सीधी आर्थिक मदद की कमी है। यदि सरकार की ओर से किसानों को पूरा सहयोग मिले, तो वे बड़े पैमाने पर जैविक खेती को विस्तार दे सकते हैं और पूरे कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति ला सकते हैं।
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