कर्नाटक पुलिस ने सेक्सटॉर्शन, ब्लैकमेलिंग और रिवेंज पोर्नोग्राफी से जुड़े मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए एक अहम कदम उठाया है। अब राज्य के सभी पुलिस थानों के लिए ऐसे मामलों में बिना देरी किए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस फैसले का मकसद पीड़ितों को त्वरित कानूनी सुरक्षा देना और दोषियों पर तेजी से शिकंजा कसना है।
सहमति का दायरा साफ किया गया
डीजीपी एम ए सलीम की ओर से जारी आदेश में एक अहम कानूनी बिंदु को रेखांकित किया गया है। आदेश के मुताबिक किसी की फोटो खींचने की सहमति देना और उस फोटो को दूसरों के साथ साझा करने की सहमति देना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। यानी अगर किसी ने अपनी मर्जी से तस्वीर खिंचवाई है, तो इसका यह मतलब नहीं कि उसे सार्वजनिक करने या दूसरों तक पहुंचाने की भी अनुमति मिल गई।
निजता के अधिकार का उल्लंघन
आदेश में स्पष्ट किया गया है कि किसी व्यक्ति की अंतरंग तस्वीरों को उसकी मर्जी के बिना वायरल करना निजता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है। ऐसी हरकत को कानून गंभीर अपराध की श्रेणी में रखता है।
कितनी सजा का प्रावधान
इस तरह के अपराध में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 77 और आईटी एक्ट की जेंडर-न्यूट्रल धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी। इन प्रावधानों में दोषी को 7 साल तक की सजा दी जा सकती है।
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