महंगी यूरिया-डीएपी से मिलेगी राहत, धान बोने से पहले अपनाएं यह प्राकृतिक उपाय, और उपजाऊ होगी खेत की मिट्टी

धान की खेती में यूरिया और डीएपी की बढ़ती कीमत व किल्लत से जूझ रहे किसानों को कृषि वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक खेती और हरी खाद का सुझाव दिया है, जिससे लागत घटती है और पैदावार बेहतर होती है।

खरीफ सीजन शुरू होते ही किसानों ने धान की खेती की तैयारी तेज कर दी है। रासायनिक खादों पर बढ़ती निर्भरता और लगातार ऊंची होती खेती लागत के बीच प्राकृतिक खेती अब किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रही है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पद्धति को अपनाकर किसान बिना किसी अतिरिक्त खर्च के बेहतर उत्पादन और ज्यादा मुनाफा हासिल कर सकते हैं।

क्या है प्राकृतिक खेती का तरीका

सीधी कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और कृषि वैज्ञानिक डॉ. शैलेंद्र गौतम के अनुसार प्राकृतिक खेती पूरी तरह प्रकृति के नियमों पर आधारित है। इसमें यूरिया, डीएपी, रासायनिक कीटनाशक या बाजार से खरीदी गई जैविक खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसी वजह से किसानों की उत्पादन लागत लगभग शून्य हो जाती है और फसल से होने वाली आमदनी सीधे लाभ में बदल जाती है।

हरी खाद और फसल अवशेष से बढ़ती है उर्वरता

विशेषज्ञों के मुताबिक धान की रोपाई से पहले खेत में ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसल बोने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। इससे रासायनिक खाद की जरूरत कम होती है, लागत घटती है और धान की पैदावार बेहतर मिलती है।

डॉ. गौतम ने बताया कि प्राकृतिक खेती में खेत में बचे फसल अवशेष यानी पुआल, डंठल और पत्तियों को मिट्टी में ही मिला दिया जाता है। इससे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु और केंचुए सक्रिय होकर भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं। जमीन ज्यादा भुरभुरी और उपजाऊ बनती है, जिससे पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और फसल का विकास बेहतर होता है। लंबे समय तक यह तरीका अपनाने से मिट्टी की सेहत में भी लगातार सुधार आता है।

सेहत के लिए बेहतर और बाजार में बढ़ती मांग

डॉ. गौतम के मुताबिक प्राकृतिक खेती से तैयार धान स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर माना जाता है। बाजार में ऐसे उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को अच्छी कीमत मिलने की उम्मीद बनी रहती है। यही कारण है कि कई किसान अब परंपरागत रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं।

धान के साथ सब्जियों की खेती भी फायदेमंद

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक खेती सिर्फ धान तक सीमित नहीं है। किसान धान के साथ-साथ सब्जियों की खेती भी कर सकते हैं। खासकर कद्दू वर्गीय फसलें जैसे लौकी, कद्दू, खीरा, करेला, तरोई, तरबूज और खरबूज इस पद्धति में बेहतर नतीजे देती हैं। इन फसलों की प्राकृतिक वृद्धि क्षमता अधिक होती है, जिससे कम संसाधनों में भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है।

टिकाऊ और लाभकारी खेती की ओर कदम

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि कम लागत, बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य और बढ़ती बाजार मांग को देखते हुए प्राकृतिक खेती किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है। जो किसान इस तकनीक को विस्तार से सीखना चाहते हैं, वे कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचकर विशेषज्ञों से प्रशिक्षण और मार्गदर्शन ले सकते हैं। इस पद्धति को अपनाकर किसान न केवल खेती की लागत घटा सकते हैं, बल्कि टिकाऊ और लाभकारी कृषि की दिशा में भी आगे बढ़ सकते हैं।

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