मध्य प्रदेश के बालाघाट में बहने वाली टांडा नदी की पहचान कभी नक्सलियों के टांडा दलम से जुड़ी हुई थी। आज वही नदी कनेक्टिविटी और विकास का प्रतीक बन चुकी है। साल 2009-10 में यह पूरा क्षेत्र लाल आतंक की गतिविधियों के लिए कुख्यात था, लेकिन करीब 35 साल लंबे नक्सलवाद के दौर के बाद अब यहां तरक्की की नई इबारत लिखी जा रही है। जिस नदी के नाम पर कभी नक्सली दलम सक्रिय था, उसी टांडा नदी पर अब 4 करोड़ रुपये की लागत से बना हाई लेवल ब्रिज लोगों की जिंदगी आसान बना रहा है।
35 साल के लंबे अरसे के बाद सिर्फ बालाघाट ही नहीं, बल्कि पूरे देश से लाल आतंक का लगभग सफाया हो चुका है। अब बालाघाट में नक्सलवाद सिर्फ किस्से-कहानियों तक सिमट गया है। इस संकट के खत्म होने के बाद इलाके में विकास की नई उम्मीद जगी है। बालाघाट की सीमाएं महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से मिलती हैं और इन्हीं रास्तों से नक्सली यहां पहुंचा करते थे। अपने संगठन का विस्तार करने के लिए वे अलग-अलग इलाकों में जोन, डिविजन और दलम बनाया करते थे। ऐसा ही एक दलम कभी एक नदी के नाम पर सक्रिय था और आज उसी नदी पर बना हाई लेवल ब्रिज मध्य प्रदेश के बालाघाट को महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से जोड़ रहा है।
नदी के नाम पर रखा गया था नक्सली दलम का नाम
बालाघाट के लांजी क्षेत्र से सालेटेकरी की ओर जाने वाले रास्ते पर टांडा नदी पड़ती है। देखने में यह एक छोटी नदी है, जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहती है और दोनों राज्यों के बीच सीमा का काम भी करती है। लेकिन इसी नदी के नाम पर कभी नक्सली दलम हुआ करता था।
वरिष्ठ पत्रकार अशोक मोटवानी बताते हैं कि बात साल 2009-10 की है, जब नक्सलियों ने अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने के लिए एक नया दलम तैयार किया था। इस दलम का नाम टांडा नदी के नाम पर रखा गया, जिसके चलते यह टांडा दलम के नाम से मशहूर हुआ। यह दलम बालाघाट के सालेटेकरी से लेकर देवरबेली इलाके तक सक्रिय रहता था।
इसके ठीक तीन साल बाद विस्तार प्लाटून बनाया गया, जिसका मकसद संगठन को अमरकंटक तक पहुंचाना था। हालांकि सुरक्षा बलों की मुस्तैदी ने उनके इस मंसूबे को नाकाम कर दिया। लगातार कमजोर पड़ते सशस्त्र आंदोलन का नतीजा यह हुआ कि टांडा दलम का मलाजखंड दलम में विलय हो गया।
2017-18 में बना 120 मीटर लंबा हाई लेवल ब्रिज
नक्सल प्रभावित ग्रामीणों की समस्याओं को हल करने के लिए साल 2017-18 में एलडब्ल्यू योजना के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को विशेष सुविधाएं देने के मकसद से 4 करोड़ रुपये की लागत से यह हाई लेवल ब्रिज बनाया गया। इसकी लंबाई करीब 120 मीटर है। पुल बनने से पहले इस इलाके के लोग बारिश के चार महीनों तक बाकी दुनिया से कट जाते थे।
अब इस पुल के बनने से न केवल ग्रामीणों की मुश्किलें दूर हुई हैं, बल्कि सुरक्षा बलों की गश्त भी तेज हुई है। नक्सली हमेशा सड़क, पुल और नेटवर्क का विरोध करते थे, क्योंकि इनके अभाव में सूचना मिलने पर भी सुरक्षा बल समय पर मौके तक नहीं पहुंच पाते थे। पुल बनने के बाद एंटी नक्सल ऑपरेशन में भी तेजी आई है।
एमपी, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र की कनेक्टिविटी हुई आसान
टांडा नदी पर पुल बनने से यात्रियों को बड़ी राहत मिली है। पहले महाराष्ट्र की ओर से बैहर, मलाजखंड, बिरसा, गढ़ी और छत्तीसगढ़ के कवर्धा, गंडई, छुईखदान तथा खैरागढ़ जाने के लिए करीब 100 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती थी। लेकिन पुल का काम पूरा होने के बाद यह दूरी काफी कम हो गई। अब महाराष्ट्र के गोंदिया, एमपी के बालाघाट और छत्तीसगढ़ के कबीरधाम के बीच आना-जाना बेहद आसान हो गया है।
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