हर तीन साल में एक माह तक अखंड सीताराम धुन, छतरपुर की बंबरबेनी पहाड़ी पर सदियों पुरानी परंपरा

छतरपुर जिले के लवकुश नगर स्थित मां बंबरबेनी की पहाड़ी पर हर 3 साल में पूरे 1 महीने तक दिन-रात अखंड सीताराम धुन कीर्तन होता है। मान्यता है कि यह धुन शहर की रक्षा करती है और अच्छी बारिश कराती है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में लवकुश नगर स्थित मां बंबर बेनी की पहाड़ी एक अनूठी धार्मिक परंपरा की साक्षी है। यहां हर 3 साल में एक बार पूरे 1 महीने तक अखंड सीताराम धुन कीर्तन का आयोजन होता है। खास बात यह है कि इस दौरान 30 दिनों तक लगातार दिन और रात बिना रुके सिर्फ सीताराम धुन गूंजती रहती है।

क्यों शुरू हुआ था कीर्तन

मान्यता है कि यह क्षेत्र पहले कम बारिश के लिए जाना जाता था। इसी कारण माता बंबरबेनी के स्थान पर सीताराम रामधुन कीर्तन की शुरुआत की गई थी। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां बंबरबेनी असल में मां सीता ही हैं, जो शहर की रक्षा करती हैं, बड़े संकटों से बचाती हैं और अच्छी वर्षा भी कराती हैं। मध्य प्रदेश सरकार इस स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में भी घोषित कर चुकी है।

परंपरा बन चुका है यह कीर्तन

मां बंबरबेनी सेवा समिति, लवकुश नगर के उपाध्यक्ष जगदीश प्रसाद नामदेव बताते हैं कि सालों से उनके लवकुश नगर में हर 3 साल पर सीताराम धुन कराई जाती है, जो 1 महीने तक चलती है। उनके अनुसार 30 दिनों तक लगातार दिन-रात यह धुन चलती रहती है और अब यह एक परंपरा बन चुकी है। वे कहते हैं कि बीते 30 सालों से तो वे खुद इसे देखते आ रहे हैं।

ऐसे हुई थी शुरुआत

जगदीश प्रसाद के मुताबिक पहले केवल बुजुर्ग लोग ही पुरुषोत्तम मास में आराधना और मंत्र जाप किया करते थे। धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आया कि अगर बच्चों और युवाओं को इस परंपरा से जोड़ना है तो इसे सरल बनाना होगा। इसके बाद उन्होंने सीताराम मंत्र जाप को संगीत के साथ पुरुषोत्तम मास में कराने का निर्णय लिया। संगीतमय सीताराम धुन बच्चों से लेकर युवाओं तक को जोड़ने लगी और इस तरह हर साल लोग जुड़ते गए तथा यह परंपरा बढ़ती चली गई।

लवकुश भगवान की नगरी

जगदीश प्रसाद बताते हैं कि यह लवकुश भगवान की नगरी है। मान्यता है कि यहीं पर मां सीता ने लव और कुश का पालन-पोषण किया था और इसी पहाड़ी पर मां सीता रहीं। यही कारण है कि इसी पहाड़ी की ऊंचाई पर सीताराम धुन कराई जाती है। माइक की आवाज से पूरे शहर के चारों ओर सीताराम धुन सुनाई देती है, और इसमें सबसे ज्यादा युवा ही मंत्र जाप करते हैं।

हर 3 साल में बनता है संयोग

जगदीश के अनुसार हर 3 साल में पुरुषोत्तम मास का संयोग बनता है। इस महीने में साधु-संत और महात्मा तपस्या, साधना तथा मंत्र जाप करते हैं। पुरुषोत्तम मास को ‘अधिक मास’ या ‘मलमास’ भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह हर तीन साल में आने वाला एक अतिरिक्त चंद्र मास है। इसे स्वयं भगवान विष्णु का सबसे प्रिय महीना माना जाता है, इसी कारण इसे ‘पुरुषोत्तम’ नाम दिया गया है।

आपदा से रक्षा की मान्यता

श्रद्धालुओं का मानना है कि पुरुषोत्तम मास में जो भी दृढ़ विश्वास के साथ साधना, आराधना और मंत्र जाप करता है, उसकी इच्छाएं पूरी होती हैं। इसी मान्यता के चलते इस महीने में सीताराम धुन कराई जाती है। माना जाता है कि इसका सकारात्मक परिणाम भी मिलता है, प्राकृतिक आपदाओं से राहत मिलती है और किसान भी खुश रहते हैं।

सूखे में हुई थी बारिश

जगदीश प्रसाद बताते हैं कि बुंदेलखंड का छतरपुर जिला सूखे के लिए जाना जाता है। एक बार जब यहां सूखा पड़ा था, तब पुरुषोत्तम मास के दौरान सीताराम धुन कराई गई थी और देवीय योग से उस समय अच्छी बारिश हुई थी। इसके बाद यह मान्यता और मजबूत हो गई कि दृढ़ विश्वास के साथ की गई सीताराम धुन कीर्तन से इच्छाएं पूरी होती हैं। वे कहते हैं कि सभी लोगों को वर्षा का परिणाम मिल चुका है, इसीलिए हर 3 साल में 1 महीने तक यह सीताराम धुन चलती है।

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