गोलों से नहीं रुका भारत: चार दशक बाद फिर रफ्तार पकड़ रहा तुलबुल प्रोजेक्ट, NHPC ने पूरा किया सर्वे

सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के बाद भारत ने झेलम नदी पर बरसों से ठप पड़े तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट को नए सिरे से शुरू करने की तैयारी कर ली है। NHPC की टीम मौके पर पहुँचकर सर्वे पूरा कर चुकी है।

भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और सिंधु जल समझौते (IWT) के स्थगित रहने के बीच केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के रणनीतिक रूप से बेहद अहम तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट (वुलर बैराज) को दोबारा जीवित करने के लिए नया खाका तैयार कर लिया है। झेलम नदी पर बनने वाली यह परियोजना पाकिस्तान की आपत्तियों और आतंकी हमलों के चलते बरसों से अटकी हुई थी, लेकिन अब इस पर तेजी से काम आगे बढ़ रहा है।

एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के डायरेक्टर स्तर की एक हाई-प्रोफाइल टीम ने हाल ही में उत्तर कश्मीर के बारामूला स्थित बारत और प्रस्तावित स्थलों का जमीनी दौरा कर हालात का जायजा लिया। NHPC अब खुद डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) तैयार कर रही है और नए सिरे से टेंडर प्रक्रिया भी शुरू करने जा रही है, जिससे घाटी में बुनियादी ढांचे के विकास को नई गति मिलने की उम्मीद जगी है।

प्रोजेक्ट से जुड़ी पाँच अहम बातें

  • दशकों पुराना गतिरोध टूटा: झेलम नदी पर बनने वाला 430 फीट लंबा तुलबुल नेविगेशन प्रोजेक्ट (वुलर बैराज) पाकिस्तान की आपत्तियों के कारण साल 1987 से ही ठप पड़ा था। अब सिंधु जल समझौते पर रोक लगने के बाद भारत बिना किसी बाहरी अनुमति के अपनी नदियों पर काम करने के लिए स्वतंत्र है।
  • NHPC की हाई-प्रोफाइल विजिट: NHPC के डायरेक्टर प्रोजेक्ट्स के नेतृत्व में एक वरिष्ठ टीम ने प्रस्तावित स्थलों का व्यापक निरीक्षण किया। अधिकारियों को साइट की स्थिति, पानी की गहराई और खुदाई की योजना को लेकर विस्तृत ब्रीफिंग दी गई।
  • सर्वे पूरा, टेंडर की प्रक्रिया शुरू: साल 2025 में NHPC ने दो टेंडर जारी किए थे। इनमें पानी की गहराई मापने वाला बाथिमेट्रिक सर्वे सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है, जबकि ड्रिलिंग से जुड़े दूसरे टेंडर को कुछ प्रशासनिक कारणों से रद्द कर दिया गया था, जिसे अब नए सिरे से अपग्रेड किया जा रहा है।
  • पाकिस्तान की आतंकी साजिशें: साल 2012 में जब राज्य सरकार ने इस परियोजना को दोबारा शुरू करने की कोशिश की थी, तब पाकिस्तान के इशारे पर साइट पर ग्रेनेड हमला किया गया और मशीनों को नुकसान पहुँचाकर काम को पूरी तरह रोक दिया गया।
  • बिजली और नौवहन का समाधान: इस बैराज के बनने से झेलम नदी में पानी का स्तर बेहतर होगा, जिससे सर्दियों में जलस्तर घटने पर भी उरी जैसी डाउनस्ट्रीम पनबिजली परियोजनाओं में बिजली उत्पादन सुचारू रूप से जारी रह सकेगा।

तुलबुल प्रोजेक्ट से भारत को क्या फायदा?

सरकार का यह कदम सिर्फ एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पूरी करना भर नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की हरकतों का करारा जियो-पॉलिटिकल जवाब भी है।

जल कूटनीति में बड़ा बदलाव

आतंकवाद के मुद्दे पर भारत साफ कर चुका है कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते। सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के बाद भारत के पास इन पश्चिमी नदियों पर अपनी जरूरत के मुताबिक नौवहन जैसी गैर-उपभोग्य गतिविधियाँ बढ़ाने का पूरा कानूनी अधिकार है। भारत के अनुसार इस बैराज का मकसद पानी रोकना नहीं, बल्कि सर्दियों में झेलम नदी को जहाजों के चलने लायक बनाना है।

जम्मू-कश्मीर को आर्थिक और ऊर्जा लाभ

कश्मीर घाटी में सर्दियों के दौरान झेलम का जलस्तर बहुत गिर जाता है, जिससे पनबिजली उत्पादन भारी रूप से घट जाता है। तुलबुल परियोजना के जरिए पानी के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकेगा, जिससे उरी जैसी डाउनस्ट्रीम परियोजनाओं को लगातार पानी मिलेगा और सर्दियों में होने वाली बिजली किल्लत से घाटी को राहत मिलेगी। इसके साथ ही कृषि, मत्स्य पालन और जल परिवहन को भी बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

तुलबुल प्रोजेक्ट क्या है और इतने समय तक क्यों रुका रहा?

यह झेलम नदी और वुलर झील के मुहाने पर बनने वाली एक नौवहन परियोजना है, जिसे झेलम में पानी का स्तर नियंत्रित करने के लिए डिजाइन किया गया है। पाकिस्तान ने इसे सिंधु जल समझौते का उल्लंघन बताते हुए आपत्ति जताई थी, जिसके बाद साल 1987 में इसका निर्माण कार्य रोक दिया गया था। आतंकी हमलों के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित कर दिए जाने के कारण अब इस काम में फिर से तेजी आ गई है।

2025 के टेंडर की मौजूदा स्थिति

दस्तावेजों के अनुसार NHPC ने दो टेंडर जारी किए थे। इनमें से पानी के भीतर की गहराई मापने वाला बाथिमेट्रिक सर्वे पूरा हो चुका है। ड्रिलिंग और खुदाई से जुड़ा दूसरा टेंडर प्रशासनिक कारणों से रद्द कर दिया गया था, लेकिन अब NHPC खुद पूरी योजना को आगे बढ़ा रही है।

पाकिस्तान की आपत्ति और आम लोगों को फायदा

पाकिस्तान को डर है कि इस बैराज के जरिए भारत झेलम नदी के पानी का प्रवाह रोक सकता है, जिससे वहाँ सूखे जैसे हालात बन सकते हैं। इसी डर के चलते पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अड़ंगा लगाया और 2012 में साइट पर ग्रेनेड व आतंकी हमले करवाकर काम पूरी तरह ठप करा दिया था।

सर्दियों के महीनों यानी अक्टूबर से फरवरी के बीच जब झेलम का जलस्तर घट जाता है, तो कश्मीर में बिजली उत्पादन लगभग ठप हो जाता है। इस बैराज के बनने से पानी का नियंत्रित बहाव सुनिश्चित होगा, जिससे उरी जैसे डाउनस्ट्रीम हाइड्रो प्रोजेक्ट सर्दियों में भी पूरी क्षमता से बिजली बना सकेंगे और घाटी का जल परिवहन सुगम होगा।

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