जब दुनिया की बड़ी सैन्य ताकतों का जिक्र होता है तो सबसे पहले अमेरिका, रूस, चीन और भारत जैसे देशों का नाम सामने आता है, जिनकी वायुसेनाओं में सैकड़ों लड़ाकू विमान तैनात रहते हैं। लेकिन यूरोप में एक ऐसा देश भी है जिसकी समूची वायुसेना सिर्फ एक विमान के भरोसे चलती है। यह देश है पश्चिमी यूरोप में बसा छोटा सा राष्ट्र लक्ज़मबर्ग।
क्षेत्रफल और आबादी, दोनों ही पैमानों पर लक्ज़मबर्ग दुनिया के सबसे छोटे देशों में गिना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि इसकी वायुसेना के पास महज एक ही सैन्य विमान है, जिसकी वजह से इसे दुनिया की सबसे छोटी वायुसेनाओं में शुमार किया जाता है। हालांकि बीते कुछ वर्षों में देश ने अपनी हवाई क्षमताओं को लगातार बढ़ाने की कोशिश की है।
आखिर कौन सा है वह इकलौता विमान
लक्ज़मबर्ग का एयर कंपोनेंट (Air Component) आधिकारिक रूप से 2020 में स्थापित हुआ था। फिलहाल इसमें एक Airbus A400M Atlas सैन्य परिवहन विमान शामिल है, जिसे दुनिया के सबसे आधुनिक सैन्य परिवहन विमानों में गिना जाता है। यह विमान ब्रसेल्स के नजदीक स्थित मेल्सब्रोक एयर बेस (Melsbroek Air Base) पर तैनात है। हैरानी की बात यह है कि मौजूदा समय में लक्ज़मबर्ग की सशस्त्र सेनाओं के पास अपना कोई समर्पित सैन्य एयरबेस तक नहीं है।
बेड़े में और क्या-क्या शामिल
एक विमान के अलावा लक्ज़मबर्ग ने अपनी हवाई ताकत बढ़ाने के लिए कुछ और खरीदारी भी की है। देश ने दो Airbus H145M सैन्य हेलीकॉप्टर, एक Airbus A330 MRTT (Multi Role Tanker Transport) विमान और कई मानव रहित विमान (UAVs) भी हासिल किए हैं। आने वाले वर्षों में सरकार सामरिक एयरलिफ्ट और समुद्री निगरानी के लिए अतिरिक्त विमान तथा हेलीकॉप्टर खरीदने की योजना पर भी काम कर रही है।
52 साल बाद मिला अपना विमान
लक्ज़मबर्ग की कहानी का सबसे रोचक पहलू यह है कि देश ने 1968 में अपने आखिरी तीन Piper PA-18 Super Cub विमानों को सेवा से बाहर कर दिया था। इसके बाद लंबे समय तक देश के पास कोई सैन्य विमान नहीं रहा। वर्ष 2001 में सरकार ने एक A400M खरीदने का निर्णय लिया, लेकिन कार्यक्रम में देरी के चलते इसकी डिलीवरी अक्टूबर 2020 में हो सकी। यानी अपना नया सैन्य विमान पाने के लिए लक्ज़मबर्ग को पूरे 52 साल का इंतजार करना पड़ा।
लड़ाकू विमान क्यों नहीं रखता यह देश
लक्ज़मबर्ग की आबादी करीब 7 लाख के आसपास है और इसका क्षेत्रफल भी बहुत छोटा है। ऐसे में देश को बड़ी तादाद में लड़ाकू विमानों की जरूरत ही नहीं पड़ती। इसके साथ ही लक्ज़मबर्ग NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) का सदस्य है। किसी भी बाहरी खतरे की सूरत में NATO के दूसरे सदस्य देश उसकी सुरक्षा में सहयोग करते हैं।
यही वजह है कि लक्ज़मबर्ग ने अपनी रक्षा नीति को सीमित मगर आधुनिक सैन्य क्षमताओं पर केंद्रित रखा है। देश साइबर सुरक्षा, सैन्य उपग्रहों और अंतरराष्ट्रीय अभियानों में भागीदारी जैसे क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देता है।
https://hindi.news18.com/news/defence/the-world-smallest-air-force-the-remarkable-case-of-luxembourg-ws-l-10575958.html