हैदराबाद: मशीनों के युग में भी सांस ले रही नवाबी कारचोब कला, सुई-धागे से इतिहास रच रहे अफजल मियां

हैदराबाद के लाड बाजार में 1947 से चल रही अफजल मियां कारचोब वाले की दुकान आज भी हाथों से होने वाली जरी और लाम्पी कढ़ाई के लिए मशहूर है। मशीनी कढ़ाई के दौर में यह दुकान नवाबी विरासत और पारंपरिक हुनर को जीवित रखे हुए है।

तेज रफ्तार आधुनिकता और रेडीमेड कपड़ों के इस जमाने में, जब फैशन का चेहरा हर रोज बदल रहा है, हैदराबाद के पुराने शहर की एक छोटी सी दुकान आज भी अपने भीतर पूरा इतिहास संजोए खड़ी है। चारमीनार के नजदीक लाड बाजार की ऐतिहासिक गलियों में मौजूद अफजल मियां कारचोब वाले की यह दुकान नवाबों के दौर की हाथ से की जाने वाली परंपरागत कढ़ाई की धरोहर को आज तक सहेजे हुए है।

देश की आजादी के साल यानी 1947 में शुरू हुई यह दुकान करीब 79 बरस बाद भी अपनी पुरानी प्रतिष्ठा और महीन कारीगरी के लिए पहचानी जाती है। यहां हाथों से ही कारचोब कढ़ाई की जाती है और यह दुकान खासतौर पर जरी और लाम्पी के काम के लिए जानी जाती है। बदलते फैशन के बीच भी यहां डिजाइनर परिधानों पर काम जारी है, जो इस विरासत को आगे बढ़ाने का जरिया बन गया है।

क्या है कारचोब कला

यह दुकान विशेष रूप से कारचोब कला के लिए मशहूर है। फारसी शब्द “कारचोब” का मतलब होता है लकड़ी का ढांचा। इस कला में मखमल या रेशम के कपड़े को एक बड़े लकड़ी के फ्रेम पर, जिसे स्थानीय भाषा में “अड्डा” कहा जाता है, चारों ओर से कसकर बांधा जाता है। इसके बाद कुशल कारीगर सुई-धागे, जरी, सितारों और मोतियों की मदद से कपड़े पर उभरे हुए बेहद खूबसूरत और शाही डिजाइन उकेरते हैं।

एक वक्त था जब इस तकनीक का इस्तेमाल राजा-नवाबों की पोशाकों, शाही दरबार के पर्दों और तलवारों की म्यानों को सजाने के लिए किया जाता था।

पीढ़ियों से संभाली जा रही विरासत

दुकान को आज संभाल रहे लोगों का कहना है कि उनके पिता अफजल मियां ने इस विरासत की नींव रखी थी, जिसे वे आज भी पूरी निष्ठा से आगे ले जा रहे हैं। जिस दौर में बाजार मशीनों और कंप्यूटर आधारित कढ़ाई से अटा पड़ा है, उसमें भी इस दुकान का हर टांका हाथ से लगाया जाता है।

यही कारण है कि यहां तैयार होने वाली पारंपरिक हैदराबादी लाम्पी, किरन और जरी के बारीक काम की मांग देश के बड़े फैशन डिजाइनरों के बीच आज भी बनी हुई है।

समय के साथ बदला अंदाज

वक्त के साथ इस दुकान ने खुद को आधुनिक फैशन के हिसाब से भी ढाल लिया है। अब यहां पारंपरिक लहंगों और शेरवानियों के साथ-साथ डिजाइनर ड्रेसेस, कुर्तियों और दूसरे आधुनिक परिधानों पर भी कारचोब का अनूठा काम किया जाता है।

अफजल मियां कारचोब वाले की यह दुकान महज एक व्यापारिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि हैदराबाद की तहजीब, कला और गंगा-जमुनी संस्कृति की एक बेशकीमती धरोहर है, जो आज भी अपनी सुई और धागे से इतिहास के सुनहरे पन्नों को जिंदा रखे हुए है।

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