उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अखिलेश यादव का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है, लेकिन साल 2027 का विधानसभा चुनाव उनके लिए बिल्कुल अलग किस्म की कड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA के जिस नारे को आधार बनाकर सपा ने कामयाबी हासिल की थी, अब उसी वोट बैंक के दो बड़े चेहरे अखिलेश के सामने एक नई पहेली बनकर खड़े हैं। ये दो चेहरे हैं एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद।
अखिलेश यादव के सामने धर्मसंकट यह है कि अगर वह इन दोनों दलों को यूपी में अपना आधार खड़ा करने का मौका देते हैं, तो आगे चलकर यही फैसला उन्हीं के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बयानों और सियासी हलचलों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। कांग्रेस जहां चंद्रशेखर आजाद को इंडिया गठबंधन के बड़े ढांचे में फिट करना चाहती है, वहीं अखिलेश इस विचार के साथ सहज नहीं दिख रहे।
चारों दलों के बीच क्या बनेगी कोई बात?
इमरान मसूद का यह कहना कि मोदी का मुकाबला सिर्फ राहुल गांधी ही कर सकते हैं, अब कई मायनों में देखा जा रहा है। उनका यह बयान भी चर्चा में है कि अगर मोदी को हराने के लिए राहुल गांधी का साथ नहीं दिया गया तो सबका हाल बंगाल में टीएमसी जैसा हो जाएगा। माना जा रहा है कि ओवैसी और चंद्रशेखर को साथ लाकर कांग्रेस पीडीए वोट के बिखराव को रोकना चाहती है। लेकिन अखिलेश यादव को आशंका है कि यही कदम भविष्य में उनके लिए गले की फांस बन जाएगा।
ओवैसी और चंद्रशेखर को क्यों दूर रखना चाहते हैं अखिलेश
राजनीतिक गलियारों और भीतरी रणनीतिक बैठकों की मानें तो अखिलेश यादव इन दोनों नेताओं को गठबंधन के मंच पर लाने से जानबूझकर बच रहे हैं। इसके पीछे दो ठोस रणनीतिक वजहें और गहरे राजनीतिक डर काम कर रहे हैं।
1. नेतृत्व का टकराव और वोट बैंक पर पकड़ की जंग
नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद तेजी से पश्चिमी यूपी और पूरे प्रदेश के युवाओं के बीच दलित राजनीति के नए प्रतीक के रूप में उभरे हैं। अखिलेश यादव को डर है कि अगर चंद्रशेखर को गठबंधन में बड़ी भूमिका दी गई, तो सपा के खेमे में आया गैर-जाटव दलित वोट पूरी तरह चंद्रशेखर की ओर खिसक सकता है, जिससे सपा की आगे की राजनीति कमजोर पड़ेगी। ओवैसी के मामले में भी यही समीकरण है। उनके मंच पर आने से मुस्लिम युवाओं के बीच एक समानांतर नेतृत्व खड़ा हो सकता है, जो अखिलेश के एकछत्र नेतृत्व को चुनौती देगा।
2. ध्रुवीकरण का डर और सॉफ्ट हिंदुत्व का संतुलन
अखिलेश यादव यह बखूबी समझते हैं कि असदुद्दीन ओवैसी के गठबंधन में शामिल होते ही भारतीय जनता पार्टी को चुनाव को सीधे हिंदू-मुस्लिम के नैरेटिव पर ले जाने का अवसर मिल जाएगा। ओवैसी की तीखी बयानबाजी से गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण जातियां, जो मौजूदा सरकार से नाराज होकर सपा-कांग्रेस गठबंधन की ओर झुकी थीं, फिर से भाजपा के पाले में लामबंद हो सकती हैं।
इमरान मसूद का बयान और 2027 की शतरंजी चुनौतियां
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गहरी पकड़ रखने वाले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि सीटों के तालमेल और छोटे दलों को साथ लाने का फैसला मेज पर बैठकर बिना किसी देरी के किया जाना चाहिए। मसूद और कांग्रेस का एक खेमा चाहता है कि पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर आजाद की ताकत को जोड़कर एक ऐसा अभेद्य किला तैयार किया जाए, जिससे बीजेपी को मात दी जा सके।
राहुल गांधी के सामने 'संकटमोचक' की भूमिका
अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि अगर वह इन दोनों को बाहर रखते हैं, तो ये दल स्वतंत्र रूप से या तीसरे मोर्चे के रूप में चुनाव लड़कर सपा के कोर मुस्लिम-दलित वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। इस पूरी त्रिकोणीय खींचतान में कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी की भूमिका सबसे अहम साबित होने वाली है।
राहुल गांधी के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर दलित और वंचित समाज को जोड़ने के अपने वादे के तहत चंद्रशेखर आजाद जैसे नेताओं को तवज्जो देनी है। दूसरी ओर उन्हें यह भी सुनिश्चित करना है कि इस कदम से इंडिया गठबंधन के सबसे मजबूत स्तंभ अखिलेश यादव नाराज न हों, क्योंकि यूपी में जमीनी संगठन और कैडर के लिहाज से समाजवादी पार्टी ही बड़े भाई की भूमिका में है।
रणनीतिकारों का मानना है कि राहुल गांधी इस उलझन को सुलझाने के लिए बीच का रास्ता अपना सकते हैं। इसके तहत चंद्रशेखर को सीधे कांग्रेस के कोटे से कुछ सीटें देकर या राष्ट्रीय स्तर पर समायोजित कर अखिलेश यादव के स्थानीय हितों की रक्षा की जा सकती है, ताकि 2027 के महामुकाबले से पहले विपक्षी एकता बिखरने न पाए।
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