तृणमूल कांग्रेस के संभावित कांग्रेस-विलय की अटकलों के बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संस्थापक शरद पवार का करीब दो साल पुराना एक बयान एक बार फिर राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि वक्त के साथ कांग्रेस से अलग होकर बनी पार्टियों और दूसरे क्षेत्रीय दलों के सामने कांग्रेस के नजदीक जाने या उसमें विलय का विकल्प खुला रहेगा। यहां तक कि उन्होंने यह भी कह दिया था कि उन्हें अपनी पार्टी और कांग्रेस में कोई अंतर नजर नहीं आता।
कैसे शुरू हुई विलय की चर्चा
तृणमूल कांग्रेस में पहले 58 विधायकों और उसके बाद 20 सांसदों की बगावत के बाद जब ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की मुलाकात हुई, तो एक नए राजनीतिक घटनाक्रम के संकेत मिलने लगे। इस मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की बैठक से इन कयासों को और बल मिला। हर मीडिया मंच पर यह सवाल तैरने लगा कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय करने जा रही हैं।
इन्हीं खबरों के बीच कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्षों की बैठक बुला ली। हालांकि कुछ ही घंटों में जयराम रमेश और टीएमसी प्रवक्ताओं ने इन चर्चाओं पर विराम लगा दिया और कांग्रेस की ओर से बुलाई गई प्रदेश अध्यक्षों की बैठक टाल दी गई। फिलहाल विलय की खबर तो थम गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह बहस जारी है कि क्या कभी कांग्रेस से अलग होकर बने क्षेत्रीय दल दोबारा उसी में समाहित हो जाएंगे।
दोनों पहलुओं पर हो रही चर्चा
इस बहस के दो पहलू सामने आ रहे हैं। एक तरफ यह सवाल उठ रहा है कि कांग्रेस से अलग हुए क्षेत्रीय क्षत्रप क्या अपनी पुरानी कड़वाहट भुला पाएंगे। दूसरी ओर यह दलील दी जा रही है कि अगर क्षेत्रीय दलों को अपना अस्तित्व बचाना है तो उन्हें खुद को कांग्रेस के करीब दिखाना ही होगा। यह बहस पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार और उसके बाद पार्टी के बिखराव के साथ शुरू हुई है।
शरद पवार ने पहले ही कर दी थी 'भविष्यवाणी'
हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के संस्थापक शरद पवार ने करीब दो साल पहले, 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ही यह तस्वीर भांप ली थी। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने इंडियन एक्सप्रेस में अपने कॉलम में लिखा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान शरद पवार ने उनसे कहा था— 'अगले कुछ सालों में कई क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के और करीब आ जाएंगी, या वे कांग्रेस में विलय के विकल्प पर विचार कर सकती हैं।'
जब उनसे पलटकर पूछा गया कि क्या वे अपनी नई पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के लिए भी ऐसा कोई विकल्प देखते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया था कि उन्हें अपनी पार्टी और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं दिखता। वरिष्ठ पत्रकार मानती हैं कि उस समय शरद पवार ने इंटरव्यू के जरिए कांग्रेस तक एक संदेश पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोई खास प्रतिक्रिया न मिलने पर मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
नड्डा के बयान पर पवार की तीखी प्रतिक्रिया
साल 2022 में पटना की एक जनसभा में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था— 'सभी क्षेत्रीय दल एक समय के बाद खत्म हो जाएंगे और केवल बीजेपी ही बचेगी।' इस बयान पर शरद पवार ने उस वक्त तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि बीजेपी अपने सहयोगियों को ही खत्म करना चाहती है। आज भारतीय जनता पार्टी अपने बढ़ते जनाधार के साथ क्षेत्रीय ताकतों को समेटती हुई नजर आ रही है और इसके कई उदाहरण सामने हैं।
एक के बाद एक बिखरते दल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के एक महीने के भीतर ही पूरी पार्टी बिखर गई। पार्टी के 80 में से 58 से ज्यादा विधायकों ने अलग गुट बनाकर विधानसभा में अलग मान्यता हासिल कर ली। इसी तरह केंद्र में लोकसभा के 28 में से 20 सांसदों ने खुद को नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय कर एनडीए को समर्थन देने की घोषणा कर दी। इससे पहले राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के 10 में से 7 सांसद अलग होकर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।
महाराष्ट्र में बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी पहले ही दो-दो टुकड़ों में बंट चुकी हैं और दोनों दलों का एक-एक धड़ा इस समय बीजेपी के साथ सत्ता में है। शरद पवार की पार्टी तोड़ने वाले उनके भतीजे अजीत पवार की मौत के बाद अब उनकी पार्टी का अस्तित्व कितने दिन रहेगा, इस पर भी चर्चा छिड़ गई है। उधर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के एक और टुकड़े होने की चर्चा जोरों पर है। हाल ही में उद्धव ठाकरे ने अपने सांसदों की बैठक बुलाई थी, जिसमें नौ में से पांच सांसद नहीं पहुंचे।
दक्षिण से लेकर उत्तर तक एक ही तस्वीर
तमिलनाडु में डीएमके के साथ चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस चुनाव बाद टीवीके के साथ गठबंधन में चली गई, और अब बीजेपी की डीएमके से बातचीत की खबरें आ रही हैं। इससे पहले जयललिता की मौत के बाद एआईडीएमके पर बीजेपी का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखा है। बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में 2025 का चुनाव जीतने के बाद बीजेपी ने बेहद सहजता से उन्हें राज्यसभा भेजकर सम्राट चौधरी के रूप में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बना लिया।
बिहार में ही रामविलास पासवान की पार्टी के दो टुकड़े किए जा चुके हैं, हालांकि चिराग पासवान किसी तरह अपनी नई पार्टी का अस्तित्व बचाने में कामयाब रहे हैं, जबकि उपेंद्र कुशवाहा पर अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कराने का भारी दबाव बनाए जाने की खबरें मीडिया में हैं।
यूपी से पंजाब तक सहयोगियों की हालत
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में एनडीए की सहयोगी अनुप्रिया पटेल की अपना दल (सोनेलाल), जयंत चौधरी की आरएलडी, संजय निषाद की निषाद पार्टी और ओपी राजभर की सुभासपा भी करीब-करीब बीजेपी पर निर्भर नजर आती हैं। हालिया चुनावों में इन सभी क्षेत्रीय पार्टियों का अपना जनाधार काफी घटा है, ऐसे में बीजेपी के साथ गठबंधन में बने रहना इनकी मजबूरी बन गया है।
दिल्ली से सटे हरियाणा और पंजाब में बीजेपी की पूर्व सहयोगी पार्टियां भी अपने अंतिम दौर में हैं। देवीलाल चौटाला की पार्टी इनेलो हरियाणा में अपना अस्तित्व लगभग खो चुकी है। ओपी चौटाला के पोते दुष्यंत चौटाला ने जननायक जनता पार्टी बनाकर 10 सीटें जीतीं और बीजेपी के साथ सरकार में उपमुख्यमंत्री बने, लेकिन जब उन्होंने एनडीए से अलग होने की सोची तो उनकी पूरी पार्टी ही बीजेपी में विलीन हो गई। इसी तरह पंजाब में लंबे समय तक बीजेपी की सहयोगी रही शिरोमणि अकाली दल भी एनडीए से अलग होने के बाद बेहद कठिन दौर से गुजर रही है।
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