छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में बसे अंतागढ़ का नाम कभी सुनते ही लोगों के मन में सिहरन दौड़ जाती थी। घने जंगलों से घिरा यह इलाका लंबे समय तक नक्सली गतिविधियों का केंद्र माना जाता रहा। यहां सड़कें नाममात्र की थीं, संचार के साधन सीमित थे और स्वास्थ्य सुविधाएं लगभग शून्य के बराबर। किसी के गंभीर रूप से बीमार पड़ने पर इलाज से ज्यादा बड़ी चिंता अस्पताल तक पहुंच पाने की होती थी। मलेरिया यहां की सबसे बड़ी मुसीबत था, जिसके कारण हर वर्ष सैकड़ों परिवार उजड़ जाते थे।
लेकिन आज वही अंतागढ़ का सरकारी अस्पताल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए नजीर बन चुका है। यह बदलाव किसी बड़े बजट, कॉर्पोरेट निवेश या चमत्कार से नहीं, बल्कि एक चिकित्सक की 23 साल लंबी तपस्या और दृढ़ संकल्प से आया है। यह कहानी है डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके की, जिन्होंने वर्ष 2003 में अंतागढ़ में कदम रखा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 23 साल पहले शुरू किए अपने अभियान को उन्होंने अब एक मॉडल का रूप दे दिया है।
जब लोगों ने मना किया कि वहां मत जाओ
वर्ष 2003 में जब डॉक्टर रामटेके की नियुक्ति अंतागढ़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई, तब यह क्षेत्र डॉक्टरों के लिए सबसे कठिन पोस्टिंग में गिना जाता था। नक्सली घटनाएं आए दिन होती रहती थीं और कई गांव ऐसे थे जहां पहुंचने के लिए घंटों पैदल चलना पड़ता था। पूरे विकासखंड में न कोई निजी डॉक्टर था, न कोई नर्सिंग होम और न ही कोई निजी अस्पताल। ऐसे माहौल में अधिकतर लोग वहां लंबे समय तक काम करने की कल्पना तक नहीं कर पाते थे।
मगर डॉक्टर रामटेके ने इसे चुनौती के बजाय एक मिशन के रूप में अपनाया। स्थानीय लोग बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्होंने अस्पताल के एक कमरे को ही अपना ठिकाना बना लिया था। दिन हो या रात, वे मरीजों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते। धीरे-धीरे उन्हें यह एहसास हुआ कि इस इलाके की सबसे बड़ी बीमारी सिर्फ मलेरिया नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का डगमगाता भरोसा भी है।
गांव-गांव जाकर समझी लोगों की तकलीफ
डॉक्टर रामटेके ने इलाज को केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा। वे गांवों में जाते, आदिवासी परिवारों के बीच बैठते और उनकी भाषा तथा जीवनशैली को समझने का प्रयास करते। उन्हें पता चला कि कई लोग बीमारी को मामूली मानकर इलाज नहीं कराते थे और जब तक अस्पताल पहुंचते, तब तक हालत गंभीर हो चुकी होती थी। यहीं से उन्होंने एक अलग रणनीति बनाई। उनका मानना था कि बीमारी का इलाज अस्पताल में नहीं, बल्कि समाज के भीतर जाकर करना होगा।
मलेरिया को बनाया सबसे बड़ा निशाना
उस दौर में अंतागढ़ में मलेरिया भयावह रूप ले चुका था। वर्ष 2003 में इस क्षेत्र का एपीआई (एनुअल पैरासाइट इंसीडेंस) 51.11 था, जो 2006 तक बढ़कर 70.65 पर पहुंच गया। अकेले वर्ष 2006 में 4,942 मलेरिया मरीज दर्ज किए गए। हालात की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि 95 से 98 प्रतिशत मामले प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया के थे, जिसे सबसे खतरनाक माना जाता है। सेरेब्रल मलेरिया और दूसरे जटिल मामलों के चलते लोगों की जान तक चली जाती थी। डॉक्टर रामटेके ने ठान लिया कि अगर अंतागढ़ की तस्वीर बदलनी है तो सबसे पहले मलेरिया को हराना होगा।
पहले जीता भरोसा, फिर हराई बीमारी
उन्होंने स्वास्थ्य विभाग, मितानिनों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदाय को एक साथ जोड़ा। गांवों में रैलियां निकाली गईं, ग्राम सभाएं आयोजित हुईं, दीवारों पर संदेश लिखे गए और घर-घर जाकर लोगों को समझाया गया कि मलेरिया से कैसे बचा जा सकता है। वर्ष 2010 और 2015 में पूरे इलाके में लॉन्ग लास्टिंग इंसेक्टिसाइडल नेट (एलएलआईएन) बांटे गए और लोगों को मच्छरदानी इस्तेमाल करने की आदत डाली गई।
इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा। लोग समय पर जांच कराने लगे और बुखार होते ही तुरंत अस्पताल पहुंचने लगे, जिससे मलेरिया की कड़ी टूटने लगी। नतीजा यह रहा कि जहां वर्ष 2006 में 4,942 मरीज थे, वहीं वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर सिर्फ 127 रह गई। एपीआई भी 70.65 से गिरकर 1.39 पर आ गया। मलेरिया से होने वाली मौतों और गंभीर मामलों में भी भारी कमी दर्ज की गई।
मलेरिया के बाद अस्पताल की कायापलट
बीमारी पर काबू पाने के बाद डॉक्टर रामटेके ने अस्पताल की सूरत बदलने का बीड़ा उठाया। उन्होंने “कायाकल्प” योजना के तहत अस्पताल को एक मॉडल संस्थान बनाने की शुरुआत की। अस्पताल परिसर की साफ-सफाई, वेस्ट मैनेजमेंट, संक्रमण नियंत्रण, मरीजों के लिए बेहतर सुविधाओं, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों पर लगातार काम किया गया। कभी दो कमरों के खपरैल भवन से चलने वाला यह स्वास्थ्य केंद्र आज 30 बिस्तरों वाले व्यवस्थित अस्पताल में बदल चुका है।
350 मानकों पर खरा उतरता अस्पताल
कायाकल्प योजना के अंतर्गत किसी भी अस्पताल का मूल्यांकन 350 से अधिक बिंदुओं पर किया जाता है। इसमें साफ-सफाई से लेकर संक्रमण नियंत्रण और मरीजों के अनुभव से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सब कुछ शामिल रहता है। अंतागढ़ अस्पताल इन सभी मानकों पर लगातार बेहतर प्रदर्शन करता आया है। पिछले पांच वर्षों से यह बस्तर संभाग में प्रथम स्थान पर बना हुआ है और वर्ष 2025 में इसे पूरे छत्तीसगढ़ के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में दूसरा स्थान मिला।
एक डॉक्टर ने बदल दीं हजारों जिंदगियां
एक ही क्षेत्र में लगातार 23 वर्षों तक काम करना अपने आप में असाधारण है, खासकर तब जब वह इलाका नक्सल प्रभावित, आदिवासी बहुल और संसाधनों की कमी से जूझ रहा हो। स्थानीय लोग कहते हैं कि डॉक्टर रामटेके केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि परिवार के सदस्य जैसे हैं। कई ऐसे बच्चे हैं जिनका जन्म उनके हाथों हुआ और आज वे युवा हो चुके हैं। कई परिवार उन्हें भगवान का रूप मानते हैं, क्योंकि उन्होंने उनके अपनों की जान बचाई।
अब पूरे छत्तीसगढ़ में लागू होगा यह मॉडल
डॉक्टर रामटेके द्वारा विकसित मलेरिया नियंत्रण और अस्पताल प्रबंधन मॉडल को अब राज्य सरकार पूरे छत्तीसगढ़ में लागू करने की तैयारी कर रही है। अधिकारियों का मानना है कि अगर अंतागढ़ जैसे कठिन क्षेत्र में यह मॉडल कामयाब हो सकता है, तो राज्य के दूसरे हिस्सों में भी स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को नई ऊंचाई दी जा सकती है।
डर से भरोसे तक का सफर
अंतागढ़ की यह कहानी सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है जिसे एक डॉक्टर ने समाज में जगाया और उस बदलाव की कहानी है जिसमें बंदूक और बारूद की खबरों के बीच स्वास्थ्य, सेवा और उम्मीद ने अपनी जगह बनाई। कभी जिस इलाके की पहचान नक्सली हिंसा और मलेरिया से होती थी, आज वही इलाका स्वास्थ्य सेवाओं के मॉडल के रूप में पहचाना जा रहा है। इस बदलाव के केंद्र में खड़े हैं डॉक्टर भेषज कुमार रामटेके, जिन्होंने साबित कर दिया कि समर्पण, धैर्य और सेवा भाव से सबसे कठिन भूगोल को भी बदला जा सकता है।
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