साइबर सिक्योरिटी की पढ़ाई के बाद खेती में उतरे नरेंद्र, केंचुआ खाद से बना डाला कामयाब कारोबार

सतना के इटौरा गांव के 25 वर्षीय नरेंद्र कुमार कुशवाहा ने साइबर सिक्योरिटी में ग्रेजुएशन के बाद नौकरी के बजाय केंचुआ खाद उत्पादन को व्यवसाय बनाया और अब किसानों को जैविक खेती का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

खेती को आमतौर पर एक पारंपरिक पेशा माना जाता है, लेकिन सतना जिले के इटौरा गांव के 25 वर्षीय नरेंद्र कुमार कुशवाहा ने इसे आधुनिक सोच और वैज्ञानिक तरीकों से जोड़कर एक मिसाल कायम की है। साइबर सिक्योरिटी में ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद जहां अधिकतर युवा नौकरी की तलाश में लग जाते हैं, वहीं नरेंद्र ने मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों की लागत घटाने को अपना लक्ष्य बना लिया। आज वह केंचुआ खाद उत्पादन को एक व्यवसाय का रूप देकर अच्छी कमाई कर रहे हैं और साथ ही आसपास के किसानों को जैविक खेती का रास्ता भी दिखा रहे हैं।

पिता की सेना की नौकरी से जागी कृषि में रुचि

नरेंद्र बताते हैं कि उनके पिता सेना में थे, जिसके चलते उन्हें देश के कई राज्यों में रहने का मौका मिला। अलग-अलग इलाकों की खेती, मिट्टी और वनस्पतियों को नजदीक से देखकर उनके मन में कृषि के प्रति लगाव बढ़ता गया। गर्मियों की छुट्टियों में जब भी वह गांव आते, तो खेतों में समय बिताते और खेती-किसानी की बारीकियों को समझने की कोशिश करते। आगे चलकर मिट्टी संरक्षण और जैविक खेती से जुड़े अभियानों ने भी उन्हें गहराई से प्रभावित किया।

मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन बढ़ाने का लक्ष्य

नरेंद्र का कहना है कि आज ज्यादातर कृषि भूमि में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा काफी घट गई है। उनके अनुसार यदि मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा दी जाए, तो उसकी संरचना और उत्पादकता दोनों में सुधार आ सकता है। यही सोच उन्हें जैविक खाद उत्पादन की दिशा में ले गई। पिछले एक साल में उन्होंने देश के कई हिस्सों का दौरा किया, जहां कृषि विज्ञान केंद्रों, प्रगतिशील किसानों और विशेषज्ञों से मिले और यह समझने की कोशिश की कि कृषि अपशिष्ट को उपयोगी उत्पाद में कैसे बदला जा सकता है।

केंचुआ खाद को बनाया कारोबार का आधार

पर्याप्त अध्ययन और अनुभव हासिल करने के बाद नरेंद्र ने वर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद उत्पादन को अपना व्यवसाय बना लिया। उन्होंने अपने फार्म का नाम फ्लोरा वर्मी कंपोस्ट रखा है। फिलहाल वह पैकिंग के हिसाब से पांच किलो खाद लगभग 150 रुपये में बेच रहे हैं, जबकि थोक में दो से तीन टन की बिक्री 9 से 10 रुपये प्रति किलो की दर से करते हैं। स्थानीय किसानों, सब्जी उत्पादकों और बागवानी करने वालों के बीच उनकी खाद की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

विंडो मेथड से तैयार होती है खाद

नरेंद्र के मुताबिक, वह केंचुआ खाद बनाने के लिए विंडो मेथड का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में गोबर और जैविक अवशेषों से तैयार बेड में केंचुए छोड़े जाते हैं। शुरुआती हार्वेस्टिंग में लगभग 40 से 45 दिन लगते हैं, क्योंकि केंचुए ऊपर से नीचे की ओर भोजन करते हुए जैविक पदार्थ को खाद में बदलते रहते हैं। इसके बाद हर 15 से 20 दिन के अंतराल पर बेड की ऊपरी परत से तैयार खाद निकाली जाती है। एक ही बेड से तीन से चार बार खाद की हार्वेस्टिंग हो जाती है, जिससे उत्पादन लगातार बना रहता है।

केंचुओं का कल्चर बनता है अगली फसल की नींव

जब बेड से तैयार खाद निकाल ली जाती है, तो नीचे केंचुओं, उनके बच्चों और अंडों का समूह बच जाता है, जिसे कल्चर कहा जाता है। नरेंद्र इस जीवित कल्चर को नए गोबर और जैविक सामग्री वाले बेड में स्थानांतरित कर देते हैं, जिससे खाद बनाने का नया चक्र शुरू हो जाता है। यही वजह है कि उनके यहां सालभर उत्पादन चलता रहता है और नए केंचुए खरीदने की जरूरत भी कम पड़ती है।

किसानों को दे रहे प्रशिक्षण

नरेंद्र का काम सिर्फ खाद बेचने तक सीमित नहीं है। वह आसपास के गांवों में किसानों को वर्मी कम्पोस्ट बनाने की तकनीक भी सिखाते हैं। उनका मानना है कि अगर किसान अपने खेतों में मौजूद गोबर और कृषि अवशेषों का सही उपयोग करें, तो रासायनिक खादों पर होने वाला खर्च काफी हद तक घटाया जा सकता है। कई किसान उनके मार्गदर्शन में खुद भी केंचुआ खाद तैयार करने लगे हैं।

पौधों के लिए पोषण का खजाना

जैविक खेती में केंचुआ खाद को बेहद उपयोगी माना जाता है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों के साथ-साथ कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक, आयरन और मैंगनीज जैसे सूक्ष्म तत्व भी मौजूद रहते हैं। इतना ही नहीं, केंचुओं की पाचन प्रक्रिया से गुजरने के कारण इसमें प्राकृतिक ग्रोथ हार्मोन, ह्यूमिक एसिड और कई लाभकारी एंजाइम भी शामिल हो जाते हैं, जो पौधों की जड़ों को मजबूत बनाते हैं और उनकी वृद्धि को तेज करते हैं।

जीवामृत और केंचुआ खाद का दमदार मेल

नरेंद्र अपने खेतों में केंचुआ खाद के साथ जीवामृत का भी इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि दोनों का संयुक्त प्रयोग मिट्टी के लिए बेहद फायदेमंद साबित होता है। जहां केंचुआ खाद मिट्टी को कार्बनिक पदार्थ और पोषक तत्व देती है, वहीं जीवामृत लाभकारी सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाने का काम करता है। इससे मिट्टी अधिक जीवंत, उपजाऊ और फसलों के अनुकूल बन जाती है। यही कारण है कि उनकी खेती में उत्पादन और मिट्टी की गुणवत्ता, दोनों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

युवाओं के लिए प्रेरणा बने नरेंद्र

साइबर सिक्योरिटी की पढ़ाई के बाद खेती और जैविक खाद उत्पादन को करियर बनाना आसान फैसला नहीं था, लेकिन नरेंद्र ने यह साबित कर दिया कि अगर सोच नई हो और काम करने का जुनून हो, तो खेती भी एक लाभदायक व्यवसाय बन सकती है। आज वह न केवल अपने लिए रोजगार पैदा कर रहे हैं, बल्कि क्षेत्र के किसानों को टिकाऊ और कम लागत वाली खेती की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं।

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