बारिश के मौसम में सब्जियों की खेती न सिर्फ आसान होती है, बल्कि यह किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरिया भी बन सकती है। यदि आप इस सीजन में सब्जियां उगाकर बेहतर मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो यही उपयुक्त समय है। जून और जुलाई के महीने सब्जियों की बुवाई के लिए सबसे अनुकूल माने जाते हैं, लेकिन इसके लिए सही वक्त पर बीज डालना सबसे अहम शर्त है। छतरपुर के नौगांव स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के उद्यानिकी वैज्ञानिक डॉ. कमलेश अहिरवार ने मानसून में सब्जी उत्पादन को लेकर किसानों को कुछ जरूरी सुझाव दिए हैं।
15 जून तक रुकना जरूरी
डॉ. कमलेश अहिरवार के मुताबिक, किसानों को 15 जून तक सब्जियां लगाने से परहेज करना चाहिए। इस समय तापमान 40 डिग्री से अधिक बना हुआ है, जिससे फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। प्री-मानसून के दौरान बारिश लगातार नहीं होती और इससे उमस तथा गर्मी दोनों बढ़ जाती हैं। ऐसे में बेहतर यही होगा कि किसान 15 जून के बाद ही खेती की तैयारी में जुटें।
मानसून और बुवाई का उपयुक्त समय
मध्यप्रदेश में मानसून आमतौर पर 15 जून के आसपास दस्तक देता है, जबकि छतरपुर जिले में यह 25 जून तक पहुंच जाता है। डॉ. अहिरवार सलाह देते हैं कि जब 8 से 10 दिन तक लगातार बारिश हो जाए और तापमान में गिरावट आ जाए, तभी सब्जियों की बुवाई शुरू करनी चाहिए। मानसून का प्राकृतिक पानी फसलों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होता।
कौन-सी सब्जियां देंगी ज्यादा मुनाफा
बरसात के मौसम में कुछ खास सब्जियों की बाजार में जबरदस्त मांग रहती है। इनमें मुख्य रूप से टमाटर, बैंगन और मिर्च शामिल हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन तीनों सब्जियों की ऊंची मांग के चलते किसान अच्छा लाभ कमा सकते हैं। इसके अलावा किसान कद्दू, करेला, गिल्की और लौकी जैसी सब्जियां भी उगा सकते हैं।
हालांकि इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कद्दू, करेला और गिल्की की पैदावार गर्मी की तुलना में बरसात में कुछ कम रहती है।
हरी खाद से बढ़ेगी मिट्टी की ताकत
जून के महीने में किसान अपने खेत की मिट्टी को और अधिक उपजाऊ बना सकते हैं। डॉ. कमलेश बताते हैं कि किसान अपने आधे या एक एकड़ खेत में मूंग जैसी दलहन फसल लगा सकते हैं। ये दलहन फसलें हवा से नाइट्रोजन खींचकर मिट्टी में संग्रहित करती हैं, जो खाद के रूप में फायदेमंद साबित होती है।
करीब 45 दिनों के बाद इस फसल को खेत में ही जोतकर मिट्टी में मिला देना चाहिए, जिससे खेत में हरी खाद तैयार हो जाती है। पूरी तरह प्राकृतिक यह खाद मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाती है। इससे फसल को आवश्यक पोषक तत्व मिल जाते हैं और किसानों को अलग से खाद डालने की जरूरत नहीं रह जाती।
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