डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार एक साथ बैठा है, मगर हर किसी की उंगलियां मोबाइल पर चल रही हैं। ड्राइंग रूम के सोफे पर लोग कंधे से कंधा मिलाकर बैठे हैं, लेकिन असली बातचीत चैट बॉक्स में हो रही है। ऑफिस के कैफेटेरिया में लंच ब्रेक का वक्त भी स्क्रीन के नाम हो जाता है। कार और मेट्रो में सफर करते लोगों के कान में ईयरबड्स और निगाहें फोन पर टिकी रहती हैं। सब आपस में जुड़े तो हैं, पर बात करता कोई नहीं। यही वजह है कि बातचीत में शब्द लगातार घट रहे हैं और इमोजी की भरमार बढ़ती जा रही है।
इमोजी निगल रहे हैं हमारे शब्द
बातचीत हो जरूर रही है, मगर जुबान से नहीं, मोबाइल की स्क्रीन से। इमोजी बोल रहे हैं और इंसान खामोश है। असली परेशानी यही है कि इंटरनेट के जरिए हम पूरी दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन अपने ही घर में, अपने ही लोगों से, अपनी आवाज में बात करना भूलते जा रहे हैं। चुप रहना अपने आप में बुरी बात नहीं, पर मोबाइल में डूबकर मुंह बंद कर लेना सेहत के लिए खतरे की घंटी है। हाल ही में हुई एक रिसर्च के मुताबिक, लोगों के रोजाना बोले जाने वाले शब्दों में करीब 28% की कमी आई है। साल 2005 में एक व्यक्ति दिनभर में करीब 17 हजार शब्द बोलता था, जो अब घटकर करीब 12 हजार रह गया है। यानी हर साल करीब 1 लाख से ज्यादा शब्द हमारी जिंदगी से गायब हो रहे हैं।
फोन बढ़ा रहा है रिश्तों की दूरियां
मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई अध्ययन बता रहे हैं कि लोग दिन में औसतन 150 बार फोन चेक करते हैं, जबकि परिवार के साथ बातचीत का समय सिमटकर सिर्फ 20 मिनट रह गया है। मतलब घर में लोग मौजूद तो हैं, पर उनके होने का एहसास गायब है। कभी लिफ्ट में गुड मॉर्निंग कहना, दुकान पर दो बातें करना, बस स्टैंड पर मौसम की चर्चा छेड़ना, ऐसी छोटी-छोटी बातें ही दिलों के दरवाजे खोलती थीं। अब सेल्फ चेकआउट, ऑनलाइन बुकिंग, GPS और टचस्क्रीन ऑर्डरिंग ने जरूरत भर की बातचीत भी हमसे छीन ली है।
हेल्थ इमरजेंसी बनता जा रहा फोन
यह सिर्फ रिश्तों का नुकसान नहीं है, बल्कि यह एक हेल्थ इमरजेंसी की शक्ल ले सकता है। बातचीत कम होने से अकेलापन, एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। जब आवाज की गर्माहट खत्म होने लगती है, तो भावनाओं को समझने की क्षमता भी कमजोर पड़ जाती है। इसका असर शरीर पर भी साफ नजर आता है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर दबाव पड़ता है और सिरदर्द व माइग्रेन बढ़ सकता है। मोबाइल पर झुके रहने वाला पॉश्चर गर्दन और रीढ़ को प्रभावित करता है। तनाव बढ़ने पर नींद बिगड़ती है, पाचन गड़बड़ाता है और इम्यून सिस्टम पर भी बुरा असर पड़ता है।
आज से शुरू करें यह छोटी पहल
तो आज से एक छोटा-सा काम कीजिए, खाने की टेबल पर फोन को किनारे रख दीजिए। मैसेज की जगह आवाज में बात कीजिए। किसी अपने को कॉल कीजिए और किसी अजनबी से भी मुस्कुराकर दो लफ्ज कह दीजिए, क्योंकि अल्फाज ही रिश्तों का पुल हैं और इसी पुल से तन और मन को जोड़ने की शुरुआत होती है।
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