जेवर में बने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर पहली इंडिगो फ्लाइट के पहुंचने पर जहां चारों ओर उत्साह और जश्न का माहौल दिखा, वहीं यहां उतरने वाले यात्रियों को जमीनी स्तर पर भारी अव्यवस्था से जूझना पड़ा। पैसेंजर्स का आरोप है कि तमाम दावों के उलट एयरपोर्ट पर परिवहन की कोई ठोस व्यवस्था मौजूद नहीं थी। फ्लाइट से उतरने के बाद यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए न तो आसानी से कोई टैक्सी मिली और न ही वे बसें नजर आईं, जिनके संचालन के बड़े-बड़े दावे पहले से किए जा रहे थे।
लखनऊ से जेवर तक का सफर सुहाना, पर बाहर निकलते ही मुश्किल
लखनऊ से नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंची पहली इंडिगो फ्लाइट के यात्रियों ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनकी हवाई यात्रा बेहद आरामदायक और सुखद रही, लेकिन एयरपोर्ट से बाहर कदम रखते ही आगे का सफर एक बड़ी चुनौती बन गया। यात्रियों का साफ कहना है कि टर्मिनल के ठीक बाहर कोई नियमित टैक्सी सेवा मौजूद नहीं थी और जब उन्होंने ऑनलाइन कैब बुकिंग ऐप्स पर गाड़ी ढूंढने की कोशिश की, तो वहां भी एक भी कैब उपलब्ध नहीं हो सकी।
हेल्प डेस्क का जवाब- अभी नियमित टैक्सी सेवा शुरू नहीं हुई
लखनऊ से आए यात्री गर्वित शर्मा ने बताया कि वे अपने साथियों के साथ एयरपोर्ट से बाहर आने के बाद करीब 35 से 40 मिनट तक सिर्फ एक टैक्सी के लिए परेशान होते रहे। जब कोई साधन नहीं दिखा, तो उन्होंने एयरपोर्ट के हेल्प डेस्क से संपर्क किया, जहां से उन्हें बताया गया कि अभी यहां नियमित रूप से टैक्सी सेवा शुरू नहीं हुई है। इसके बाद उन्होंने ओला और उबर के जरिए गाड़ी बुक करने की कोशिश की, मगर लंबे समय तक किसी भी ड्राइवर ने उनकी बुकिंग स्वीकार नहीं की।
गर्वित का कहना है कि इतने बड़े इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने के बाद हर यात्री की पहली उम्मीद यही होती है कि उसे तुरंत साधन मिल जाए, लेकिन यहां की लचर व्यवस्था ने पहले ही दिन सबको परेशान कर दिया।
25 मिनट इंतजार के बाद खुद करनी पड़ी जुगाड़
एक अन्य यात्री शरद वत्स ने भी ट्रांसपोर्ट सिस्टम को लेकर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि लखनऊ से जेवर तक की यात्रा पूरी तरह सुगम रही, लेकिन एयरपोर्ट टर्मिनल के बाहर कदम रखते ही वे फंस गए। करीब 20 से 25 मिनट तक लगातार प्रयास के बावजूद जब कोई टैक्सी नहीं मिली, तो उन्होंने हेल्प डेस्क से दोबारा पूछा। इस बार उन्हें सलाह दी गई कि वे खुद बाहर जाकर कोई गाड़ी तलाश लें।
बाहर भी कोई साधन न मिलने पर आखिरकार उन्हें अपने एक परिचित टैक्सी ड्राइवर को फोन करना पड़ा और निजी व्यवस्था के जरिए गाड़ी मंगानी पड़ी, तब कहीं जाकर वे वहां से रवाना हो सके।
कागजों और विज्ञापनों तक सिमटी रहीं इलेक्ट्रिक बसें
यात्रियों ने यह भी दावा किया कि उन्होंने खबरों और सरकारी विज्ञापनों में पढ़ा-देखा था कि नोएडा एयरपोर्ट को शहरों से जोड़ने के लिए खास इलेक्ट्रिक बसें चलाई जाएंगी। दावों में कहा गया था कि दिल्ली-एनसीआर के अलग-अलग इलाकों से एयरपोर्ट तक बसों का सीधा संचालन होगा, ताकि लोकल कनेक्टिविटी मजबूत बनी रहे। लेकिन हकीकत यह रही कि पहले दिन यहां मौजूद यात्रियों को ऐसी एक भी बस नहीं दिखी।
हैरानी की बात यह रही कि एयरपोर्ट परिसर में इन बसों के रूट, टाइमिंग या समय-सारिणी की जानकारी देने वाला कोई बोर्ड या स्पष्ट गाइडलाइन तक मौजूद नहीं थी।
वीआईपी इंतजामों के बीच नजरअंदाज हुए आम यात्री
यात्रियों का कहना है कि एयरपोर्ट जैसी बड़ी परियोजना की सफलता के लिए जितनी जरूरी उड़ानें हैं, उतनी ही अहम वहां की कनेक्टिविटी भी है। यदि यात्रियों को बाहर निकलने के लिए घंटों इंतजार करना पड़े या निजी जुगाड़ पर निर्भर रहना पड़े, तो पूरी यात्रा का अनुभव खराब हो जाता है। खास बात यह रही कि पहले दिन पूरे परिसर में वीआईपी मूवमेंट और विशेष व्यवस्थाओं की चकाचौंध तो दिखी, लेकिन आम यात्रियों की सुविधाओं को अनदेखा कर दिया गया।
परेशान यात्रियों ने मांग की है कि एयरपोर्ट प्रशासन जल्द से जल्द टैक्सी और बस सेवाओं को सुचारू रूप से शुरू करे, ताकि आने वाले दिनों में लोगों को ऐसी असुविधा न झेलनी पड़े।
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