प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रांस दौरे के दौरान हुई वार्ताओं में रक्षा क्षेत्र की रणनीतिक साझेदारी और स्वदेशीकरण का मुद्दा सबसे आगे रहा। विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि भारत अब रक्षा खरीद के पुराने ढांचे से आगे बढ़कर सह-विकास (Co-development), सह-डिजाइन (Co-design), सह-उत्पादन (Co-production) और सह-निर्माण (Co-manufacturing) — यानी '4C' पर आधारित भागीदारी को तरजीह दे रहा है।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने एक विशेष ब्रीफिंग में कहा कि राफेल लड़ाकू विमान को लेकर भारत और फ्रांस के बीच चल रही बातचीत केवल उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद देश की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूती देना है। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना (आईएएफ) पहले से ही राफेल का संचालन कर रही है, इसलिए दोनों देशों की सरकारों और वायुसेनाओं के बीच इस विषय पर निरंतर संवाद चल रहा है।
'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भरता पर जोर
मिस्री ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने हर स्तर की बातचीत में यह स्पष्ट किया है कि भारत की रक्षा नीति का मूल लक्ष्य 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' को आगे बढ़ाना है। इसी सोच के तहत भारत चाहता है कि विदेशी सहयोग सिर्फ आयात तक न सिमटे, बल्कि तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय उत्पादन और भारतीय उद्योगों की भागीदारी को भी बढ़ावा मिले।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां ध्यान केवल सैन्य ताकत बढ़ाने पर नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने पर भी है। राफेल जैसे उन्नत प्लेटफॉर्म के स्वदेशीकरण और उत्पादन में भारतीय हिस्सेदारी बढ़ने से रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तो मजबूत होगी ही, साथ ही उच्च तकनीक, रोजगार सृजन और रक्षा निर्यात की संभावनाओं को भी नई रफ्तार मिलेगी।
राफेल के साथ कई मुद्दों पर चर्चा
विदेश सचिव ने बताया कि प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान बातचीत केवल राफेल तक सीमित नहीं रही, बल्कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के कई पहलुओं पर विचार-विमर्श हुआ।
आज की बातचीत में राफेल के अलावा कई और विषयों पर चर्चा हुई, लेकिन मुख्य बात यह थी कि किसी भी रक्षा उपकरण या प्लेटफॉर्म के लिए हमें स्थानीय स्तर पर निर्माण और स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल को ज़्यादा से ज़्यादा बढ़ाने के मकसद से आगे बढ़ना चाहिए; हमारा सहयोग इसी बात को ध्यान में रखकर तय किया जाना चाहिए।
यह बयान प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस यात्रा के पहले चरण के नीस में संपन्न होने के बाद आया। इस दौरान उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत की तथा 'भारत इनोवेट्स 2026' सम्मेलन का संयुक्त उद्घाटन किया।
भारत में बनेंगे 94 राफेल विमान
इस महीने की शुरुआत में भारत ने भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के वास्ते फ्रांस को लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की बड़ी सरकार-से-सरकार (G2G) डील के लिए 'लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट' (LoR) भेजा था। रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ सूत्रों ने बताया कि मंत्रालय के अधिग्रहण विंग ने पिछले महीने ही इस डील के लिए फ्रांसीसी सरकार के अधिकारियों को यह पत्र भेजा था। इस सौदे के तहत 94 राफेल विमानों का निर्माण भारत में फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन एक भारतीय कंपनी के साथ मिलकर करेगी।
देश में 200 के पार पहुंचेगी राफेल की संख्या
सूत्रों के अनुसार उम्मीद है कि फ्रांस अगले दो से तीन महीनों में भारत के 'लेटर ऑफ़ रिक्वेस्ट' या टेंडर का जवाब देगा और दोनों पक्ष अगले साल तक बातचीत व डील को अंतिम रूप दे सकते हैं। भारत के पास इस समय लड़ाकू विमान स्क्वाड्रनों की भारी कमी है और वह बड़ी संख्या में आधुनिक 4.5-जेनरेशन-प्लस राफेल विमानों को शामिल कर इस कमी को पूरा करने का प्रयास कर रहा है।
भारतीय वायुसेना और भारतीय नौसेना पहले ही 62 राफेल विमानों का ऑर्डर दे चुकी हैं, और 114 राफेल के नए ऑर्डर के बाद यह संख्या 176 हो जाएगी। भारतीय नौसेना ने समुद्री खतरों से निपटने के लिए ऐसे 31 और विमानों को शामिल करने की इच्छा भी जताई है, जिससे देश में राफेल विमानों की कुल संख्या 200 से ज़्यादा हो सकती है।
2028 में आएगा पहला राफेल मरीन
इस डील के तहत पहली बार ऐसा होगा जब राफेल विमानों का निर्माण फ्रांस के बाहर किया जाएगा, जिसमें लगभग 50 प्रतिशत स्थानीयकरण (लोकलाइज़ेशन) होगा। इस कार्यक्रम की प्रमुख खासियतें इस प्रकार हैं:
- 'मेक इन इंडिया' के तहत पहली बार फ्रांस के बाहर राफेल का निर्माण
- सरकार-से-सरकार (G2G) के बीच समझौता, कोई बिचौलिया नहीं
- पूरे प्रोजेक्ट में पूरी पारदर्शिता
- G2G के तहत बड़े पैमाने पर लोकलाइज़ेशन
- भारतीय हथियारों और सिस्टम को जोड़ने का पूरा अधिकार
विदेश सचिव के अनुसार, इससे लड़ाकू विमानों को तेज़ी से शामिल करने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि 2028 में पहला राफेल मरीन आना शुरू हो जाएगा और उसके कुछ समय बाद — यानी अब से लगभग साढ़े तीन साल बाद — वायुसेना के लिए भी राफेल आने शुरू हो जाएंगे। इस साल फरवरी में DAC से प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलने के बाद रक्षा सचिव ने यह जानकारी दी थी।
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