ज्योतिष में संतान प्राप्ति के 5 खास योग, अपनी जन्म कुंडली देखकर खुद लगाएं पता

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष योग बनने पर ही संतान सुख की प्राप्ति होती है। जानिए ऐसे ही पांच प्रमुख योग, जिन्हें देखकर आप अपनी जन्म पत्रिका में संतान के योग पहचान सकते हैं।

संतान सुख हर विवाहित जोड़े की सबसे बड़ी इच्छा होती है। यही वजह है कि शादी के बाद दंपति के साथ-साथ परिवार के लोग भी अक्सर यही जानना चाहते हैं कि घर में बच्चे की किलकारी कब गूंजेगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में जब कुछ खास योग बनते हैं, तभी संतान की प्राप्ति होती है। इन योगों को समझकर आप भी अपनी जन्म कुंडली देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि आपको संतान सुख कब मिलेगा।

पहला योग

कुंडली के पंचम भाव को संतान प्राप्ति का कारक माना जाता है। यही कारण है कि जब भी इस भाव के स्वामी की दशा चलती है, तब संतान की प्राप्ति होती है। इसके अलावा पंचम भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि पड़ती है, उसकी दशा के दौरान भी संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। वहीं अगर पंचम भाव में कोई ग्रह स्थित हो तो उसकी दशा में भी संतान सुख मिल सकता है।

दूसरा योग

पंचम भाव का कारक ग्रह गुरु माना गया है। ऐसे में गुरु की महादशा या अंतर्दशा के समय भी संतान प्राप्ति की प्रबल संभावना बनी रहती है। साथ ही गुरु ग्रह जहां स्थित हो, वहां से पंचम भाव में मौजूद ग्रह की महादशा-अंतर्दशा के दौरान भी संतान प्राप्त हो सकती है।

तीसरा योग

यदि चंद्रमा से पंचम भाव में स्थित ग्रह की दशा चल रही हो, तब भी संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। यानी गुरु से पंचम भाव के ग्रह की दशा में और चंद्रमा से पंचम भाव के ग्रह की दशा में, दोनों ही स्थितियों में संतान की प्राप्ति हो सकती है।

चौथा योग

कालपुरुष कुंडली में सूर्य को पंचम भाव का स्वामी कहा गया है। ऐसे में सूर्य की महादशा के दौरान भी संतान प्राप्ति के प्रबल योग बनते हैं।

पांचवां योग

नवमांश कुंडली के पंचम भाव में यदि कोई ग्रह विद्यमान हो तो उसकी महादशा के समय भी संतान प्राप्ति के योग बनते हैं। वहीं अगर नवमांश के पंचम भाव में कोई ग्रह न हो तो उस भाव की राशि के स्वामी की दशा के दौरान भी संतान प्राप्त हो सकती है।

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