पटना संग्रहालय में मौजूद है 20 करोड़ साल पुराना जीवाश्म वृक्ष, जानें इसकी अनोखी कहानी

पटना संग्रहालय में रखा करीब 20 करोड़ साल पुराना और 53 फीट लंबा जीवाश्म वृक्ष आज भी लोगों को हैरान करता है। चीड़ प्रजाति का यह दुर्लभ पेड़ 1927 में पश्चिम बंगाल के कुमारपुर में खोजा गया था।

क्या आप ऐसा पेड़ देखना चाहते हैं, जो करीब 20 करोड़ साल पुराना हो? सुनकर हैरानी हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। करोड़ों वर्ष पुराने इतिहास की यह जीवित गवाही आज भी हमारी धरती पर मौजूद है। खास बात यह है कि इसे देखने के लिए आपको किसी दूर-दराज के घने जंगल में भटकने की जरूरत नहीं, बल्कि बिहार की राजधानी पटना पहुंचना होगा। यहां एक ऐसी अनमोल धरोहर सुरक्षित है, जो करीब 20 करोड़ वर्ष पुराने अतीत की कहानी बयां करती है।

पहली नजर में पत्थर, असल में पेड़

53 फीट लंबा यह विशाल जीवाश्म वृक्ष देखने वालों को अचंभित कर देता है। पहली नजर में यह किसी बड़ी चट्टान या पत्थर जैसा प्रतीत होता है, मगर हकीकत में यह करोड़ों साल पहले जीवित रहा एक पेड़ है, जो समय के साथ पूरी तरह पत्थर में तब्दील हो गया।

संग्रहालय की खास धरोहर

यह दुर्लभ जीवाश्म वृक्ष पटना संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है, जहां आने वाले दर्शक इसे बड़ी रुचि के साथ निहारते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से यह महज एक पुराना पेड़ नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्राचीन पर्यावरण, वनस्पति और जलवायु को समझने का एक अहम माध्यम है। इसकी मौजूदगी पटना संग्रहालय को देश के उन चुनिंदा स्थानों में शामिल करती है, जहां करोड़ों साल पुराने प्राकृतिक इतिहास की झलक देखी जा सकती है।

1927 में हुई थी खोज

इस जीवाश्म वृक्ष की खोज वर्ष 1927 में पश्चिम बंगाल के आसनसोल के निकट कुमारपुर क्षेत्र में हुई थी। उस दौरान वहां रेलवे लाइन बिछाने का काम चल रहा था। खुदाई के समय मजदूरों को जमीन के भीतर दबा एक विशाल पेड़ जैसा ढांचा मिला। बाद में जब भूवैज्ञानिकों ने इसकी जांच की, तो सामने आया कि यह साधारण लकड़ी नहीं, बल्कि करोड़ों वर्ष पुराना जीवाश्म है। इसके बाद इसे संरक्षित कर आगे के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण धरोहर माना गया।

चीड़ प्रजाति का पर्मियन कालखंड का वृक्ष

वैज्ञानिकों के अनुसार यह चीड़ प्रजाति का पेड़ था, जो करीब 20 करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में था। इसके टुकड़े निचली गोंडवाना या दामुदा पर्वत श्रृंखला की ऊपरी रानीगंज परत से प्राप्त हुए थे और इसे पर्मियन कालखंड का बताया जाता है। माना जाता है कि किसी प्राकृतिक घटना के चलते यह वृक्ष नदी या जलाशय वाले इलाके में गिर गया और तेजी से मिट्टी एवं तलछट की परतों के नीचे दब गया। दब जाने से इसे ऑक्सीजन मिलना बंद हो गई, जिससे सामान्य स्थिति में होने वाली सड़न और क्षय की प्रक्रिया बेहद धीमी पड़ गई। यही वजह रही कि इसकी मूल संरचना लंबे समय तक सुरक्षित बनी रही।

कैसे पत्थर में बदला पूरा पेड़

समय बीतने के साथ इस दबे हुए वृक्ष के भीतर खनिज युक्त पानी प्रवेश करता रहा। सिलिका जैसे खनिज धीरे-धीरे लकड़ी की कोशिकाओं में जमा होने लगे। लाखों वर्षों तक चली इस प्रक्रिया में लकड़ी के जैविक तत्व नष्ट होते गए और उनकी जगह खनिजों ने ले ली। नतीजतन पूरा पेड़ पत्थर जैसी कठोर संरचना में बदल गया। इस प्रक्रिया को जीवाश्मीकरण या पाषाणीकरण कहा जाता है। यही कारण है कि आज यह वृक्ष देखने में चट्टान जैसा लगता है, लेकिन इसकी आंतरिक बनावट अब भी पेड़ की पहचान को सहेजे हुए है। इससे जुड़ी तमाम जानकारियां पटना संग्रहालय में उपलब्ध कराई गई हैं।

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