बाहर के राज्यों में जाकर किसी फैक्ट्री में आठ घंटे की मजदूरी करने से कहीं बेहतर है कि अपने घर पर रहते हुए खेत में चार घंटे मेहनत कर ली जाए। इससे एक ओर परिवार के साथ रहने का सुकून मिलता है तो दूसरी ओर अच्छी-खासी आमदनी भी हो जाती है। इसी सोच को सच कर दिखाया है छपरा (सारण) के एक प्रगतिशील किसान ने, जो अब पारंपरिक खेती को पीछे छोड़कर एक ही खेत में कई फसलें यानी मल्टी-क्रॉपिंग के जरिए दोगुना-तिगुना मुनाफा कमा रहे हैं।
यह कहानी है छपरा जिले के गरखा प्रखंड के संठा गांव के रहने वाले छेदी प्रसाद यादव की। वे पूरी तरह जैविक तरीके से खेती करते हैं। अपने 10 कट्ठा खेत में उन्होंने मचान विधि यानी मल्टी-लेयर फार्मिंग अपनाकर एक साथ लौकी और कुंदरी की बेहतरीन फसल तैयार की है। इस छोटे से खेत से वे एक सीजन में ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई कर लेते हैं।
तीन दशक से अधिक का खेती का तजुर्बा
छेदी प्रसाद यादव बचपन से ही हरी सब्जियों की खेती से जुड़े हुए हैं। खेती को लेकर उनके अनोखे विचार और तकनीक आसपास के किसानों को भी खूब भा रही है। वे पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सीजनल नकदी फसलें लगाकर बढ़िया मुनाफा कमाते हैं। उनके मार्गदर्शन में इलाके के कई दूसरे किसान भी बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती कर आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से कर पा रहे हैं।
छेदी यादव कहते हैं कि उन्होंने कभी बाहर जाकर किसी फैक्ट्री में आठ घंटे बंधुआ मजदूरी करने के बारे में नहीं सोचा। उनके मुताबिक, आठ घंटे बाहर खटने के बजाय घर पर रहकर खेत में चार घंटे काम करना ही सबसे अच्छा है। इससे वे अपने परिवार और सगे-संबंधियों से भी जुड़े रहते हैं और कमाई भी शानदार होती है। यही कारण है कि वे अपनी जिंदगी से बेहद संतुष्ट हैं।
खुद की पढ़ाई छूटी, पर बच्चों को दिला रहे उच्च शिक्षा
छेदी प्रसाद यादव बताते हैं कि वे कभी दिल्ली या पंजाब कमाने के लिए नहीं गए। पिछले 25-30 वर्षों से वे अपने गांव में ही रहकर खेती कर रहे हैं और एक खुशहाल जीवन जी रहे हैं। उनका मानना है कि बाहर जाकर दूसरों की डांट सुनने और आठ घंटे खटने से कहीं बेहतर है कि अपने घर पर रहकर नकदी फसलों पर मेहनत की जाए।
उन्होंने आगे बताया कि वे एक बार में करीब 50 किलो तक कुंदरी तोड़ते हैं। कुंदरी की खास बात यह है कि एक बार लगाने के बाद इससे लगभग 2 से 3 साल तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। इसके अलावा उसी मचान के नीचे से वे रोज 70 से 80 पीस लौकी भी तोड़ते हैं। इन सब्जियों को हर हफ्ते छपरा बाजार समिति (मंडी) ले जाकर बेच दिया जाता है।
भावुक होते हुए छेदी यादव ने बताया कि पारिवारिक गरीबी के कारण वे खुद बिहार बोर्ड (मैट्रिक) से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। लेकिन आज इसी खेती की बदौलत वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उनके बेटे पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी में भी उनका हाथ बंटाते हैं। उनका कहना है कि अगर सही तकनीक और समझदारी से खेती की जाए तो युवाओं को रोजगार के लिए पलायन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
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