आधी सदी से बरकरार वही जायका, जैन साहब की चाय बिन सूनी रहती है शिवपुरी की सुबह

शिवपुरी के पुराने कलेक्ट्रेट के पास स्थित 'जैन चाय दुकान' पिछले 50 साल से अपने अनूठे स्वाद के लिए मशहूर है और शहरवासियों के दिन की पहली जरूरत बन चुकी है।

तेजी से बदलते इस दौर में जब हर गली-मोड़ पर आधुनिक कैफे और चमचमाते टी-स्टॉल खुल रहे हैं, तब शिवपुरी के बीचों-बीच एक ऐसी जगह भी मौजूद है, जिसकी महक पिछले पांच दशकों में रत्ती भर भी नहीं बदली। पुराने कलेक्ट्रेट के नजदीक बसी 'जैन चाय दुकान' अब सिर्फ एक दुकान नहीं रही, बल्कि यहां के लोगों के दिन की पहली जरूरत बन चुकी है। इस स्वाद का असर ऐसा है कि आज भी हजारों शिवपुरीवासियों की सुबह तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक उनके होठों तक जैन साहब की कड़क चाय की पहली चुस्की न पहुंच जाए।

पिता की छोटी टपरी से शुरू हुआ पांच दशकों का सफर

इस स्वाद की विरासत को संजोए हुए दुकान के संचालक दीपक जैन जब बीते दिनों को याद करते हैं, तो यादों का एक खूबसूरत सिलसिला सामने आ जाता है। वे बताते हैं कि यह महज एक कारोबार नहीं, बल्कि उनके पिता की मेहनत से सींची गई पुश्तैनी धरोहर है। दशकों पहले उनके पिता ने एक बेहद छोटी सी टपरी से इस सफर की शुरुआत की थी। उस वक्त बोया गया मेहनत, ईमानदारी और शुद्धता का बीज आज एक ऐसा वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी छांव में पूरा शिवपुरी चाय का लुत्फ उठाता है।

दीपक जैन बड़े गर्व के साथ कहते हैं कि उनके पिता ने हमेशा एक ही बात सिखाई—दुनिया चाहे जितनी बदल जाए, लेकिन चाय की गुणवत्ता और ग्राहकों के प्रति सम्मान कभी कम नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि आधी सदी बीत जाने के बाद भी उनकी चाय का वही पारंपरिक और ठेठ जायका आज भी ज्यों का त्यों कायम है, जिसने 50 साल पहले लोगों को पहली बार अपना दीवाना बनाया था।

अफसरों की चर्चा से लेकर युवाओं के ठहाकों तक

जैन साहब की चाय का सम्मोहन देखना हो, तो यहां सुबह से शाम तक उमड़ने वाली भीड़ को देखिए। इस दुकान की बेंच पर समाज का हर रंग चाय की चुस्कियों में घुला नजर आता है। कॉलेज जाने वाले युवाओं के बेबाक ठहाके हों, फुर्सत में बैठे बुजुर्गों की पुरानी यादें हों, दिनभर की दौड़-भाग के बीच सुस्ताते व्यापारी हों या फिर कलेक्ट्रेट के गंभीर अधिकारी—हर कोई यहां आकर एक ही रंग में रंग जाता है।

सिर्फ चाय का ठिकाना नहीं, शिवपुरी की यादों का जीवंत हिस्सा

पचास वर्षों का यह लंबा और सुहाना सफर सिर्फ चाय बेचने और मुनाफा कमाने की कहानी नहीं है। यह कहानी है शिवपुरी की तीन पीढ़ियों के आपस में जुड़ने की, उनकी खुशियों और बातचीत की। यहां रोज सुबह कई ऐसे चेहरे दिखाई देते हैं, जो कभी बचपन में अपने पिता की उंगली थामकर पहली बार चाय का स्वाद चखने आए थे, और आज वे खुद अपने बच्चों और पोतों को इस ऐतिहासिक स्वाद का हिस्सा बनाने यहां लेकर आते हैं।

समय बदला, कलेक्ट्रेट पुराना हो गया, शहर की सड़कें चौड़ी हो गईं, लेकिन जैन चाय दुकान की वह चिर-परिचित खौलती चाय और उसकी महक आज भी शिवपुरी के अपनत्व, संस्कृति और पहचान का सबसे खूबसूरत प्रतीक बनी हुई है।

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