उत्तर प्रदेश के आगरा में पालक उगाने वाले किसानों के लिए यह फसल आमदनी का बेहतरीन जरिया बन गई है। पालक की खेती में लागत बेहद कम आती है, जबकि किसानों को इसका तीन से चार गुना तक मुनाफा हासिल होता है। खास बात यह है कि एक बार बीज रोपने के बाद पालक को तीन से चार बार काटा जाता है, जिससे किसानों को लगातार फायदा मिलता रहता है।
आगरा में पालक की खेती कर रहे एक किसान ने बताया कि उन्हें अपनी फसल पर लागत मूल्य से कहीं अधिक लाभकारी मूल्य मिलता है। उनका कहना है कि सीजन खत्म होने के बाद भी वे आसानी से अपनी जीविका चला लेते हैं और नया सीजन शुरू होते ही दोबारा खेती में जुट जाते हैं तथा अच्छी कमाई करते हैं।
प्रति एकड़ 10 से 15 हजार रुपये की लागत
पालक की खेती करने वाले किसानों के मुताबिक एक एकड़ में करीब 10 से 15 हजार रुपये की लागत आती है। उन्होंने बताया कि जब पालक की पैदावार शुरू होती है तो एक ही बार बीज रोपण से चार बार पालक की कटाई होती है, जिससे उन्हें अच्छा-खासा मुनाफा मिलता है।
किसानों का कहना है कि फसल में जैविक खाद के साथ-साथ कुछ कीटनाशक दवाओं का छिड़काव भी किया जाता है, क्योंकि पालक में जल्दी कीड़ा लगने की आशंका रहती है। कम लागत और बेहतर मुनाफे की वजह से आगरा के कई इलाकों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जा रही है।
30 से 40 दिन में शुरू हो जाती है पैदावार
किसान बताते हैं कि खेत में पालक तैयार होने के बाद उसे सीधे मंडी पहुंचाया जाता है, जहां व्यापारी उन्हें अच्छा लाभकारी मूल्य देते हैं। उनके अनुसार सबसे अच्छी बात यह है कि बीज रोपण के करीब 30 से 40 दिनों के भीतर ही फसल की पैदावार शुरू हो जाती है।
यमुना किनारे होती रही है खेती
आगरा में पालक की खेती नदी और यमुना के किनारे अधिक होती रही है। हालांकि किसानों का कहना है कि इस समय यमुना का पानी दूषित होने के कारण फिलहाल वहां खेती नहीं की जा रही है। एक दौर ऐसा भी था जब पालक को मुख्य रूप से यमुना के किनारे ही उगाया जाता था।
किसानों के मुताबिक आगरा में नदी किनारे और जहां जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, वहां इसकी फसल अधिक होती है। उनका कहना है कि जलोढ़ मिट्टी पालक की खेती के लिए सबसे उपयोगी मानी जाती है, क्योंकि इस मिट्टी में फसल अच्छी और भारी मात्रा में पैदा होती है। इसके अलावा नदी किनारे होने की वजह से जमीन में नमी बनी रहती है, जिससे ज्यादा पानी या सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती। हालांकि कई किसान अब इसकी खेती ऐसे खेतों में भी कर रहे हैं जो नदी किनारे नहीं हैं, बस वहां समय पर सिंचाई करनी पड़ती है।
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