बचपन में खुद थे बाल मजदूर, अब नोएडा के रिक्की राज बने हजारों बच्चों की उम्मीद; जानिए 'छोटू फाउंडेशन' की प्रेरक कहानी

नोएडा एनसीआर में सक्रिय रिक्की राज ने खुद बाल मजदूरी से अपना सफर शुरू किया और आज 'छोटू फाउंडेशन' के जरिए हजारों जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त शिक्षा से जोड़ रहे हैं। फिरोजाबाद से शुरू हुई उनकी 'छोटू की पाठशाला' अब देश के कई राज्यों तक पहुंच चुकी है।

कहा जाता है कि हौसला बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी बाधा भी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक पाती। मूल रूप से फिरोजाबाद के रहने वाले और नोएडा एनसीआर समेत देशभर में बच्चों के लिए काम कर रहे रिक्की राज की कहानी इसी बात की मिसाल है। कभी खुद बाल मजदूरी करने वाले रिक्की आज हजारों बेसहारा बच्चों की जिंदगी में शिक्षा की रोशनी पहुंचा रहे हैं।

हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है, जिस मौके पर देशभर में बाल मजदूरी के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाती है और बच्चों को शिक्षा से जोड़ने पर जोर दिया जाता है। रिक्की राज ने 'छोटू फाउंडेशन' की नींव रखकर उन बच्चों के लिए नई राह तैयार की है, जो गरीबी और मजबूरियों के कारण पढ़ाई से दूर रह जाते हैं।

ढाबे पर बीता बचपन

लोकल 18 से बातचीत में रिक्की राज ने बताया कि उनका बचपन कई संघर्षों से भरा रहा। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार में जन्मे रिक्की के पिता मजदूरी करते थे और परिवार झुग्गी-झोपड़ी में रहता था। घर के हालात खराब होने के कारण उन्हें छोटी उम्र में ही ढाबे पर काम करना पड़ा।

उन दिनों को याद करते हुए रिक्की कहते हैं कि जब बाकी बच्चे स्कूल जाते थे, तब वह काम करने को मजबूर थे। मजदूरी के दौरान उनके मन में बार-बार यही सवाल उठता था कि आखिर किसी बच्चे को बचपन में ही काम क्यों करना पड़ता है। तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने सरकारी स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की और जीवन में कुछ बड़ा करने का सपना नहीं छोड़ा।

शिक्षा से जोड़ने का मकसद

रिक्की बताते हैं कि बचपन के इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर समाज के लिए कुछ करने का जज्बा पैदा किया। साल 2018 में उन्होंने 'छोटू फाउंडेशन' की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य बाल मजदूरी और गरीबी से जूझ रहे बच्चों को शिक्षा से जोड़ना था। आज 'छोटू की पाठशाला' के जरिए हजारों बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जा रही है।

यह संस्था केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंद बच्चों को किताबें, कपड़े और दूसरी जरूरी चीजें भी मुहैया कराती है। रिक्की का मानना है कि किसी भी बच्चे को सिर्फ आर्थिक हालात की वजह से खुद को दूसरों से कमतर महसूस नहीं करना चाहिए, और हर बच्चे को आगे बढ़ने का बराबर अवसर मिलना चाहिए।

आत्मनिर्भर बन रहे बच्चे

रिक्की बताते हैं कि वह कभी पत्रकार बनना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें एक अलग राह पर ला खड़ा किया। हालांकि इसका उन्हें कोई अफसोस नहीं है। उनका कहना है कि आज वह जिस तरह बच्चों की जिंदगी बदल रहे हैं, वही उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।

छोटू फाउंडेशन से पढ़कर निकले कई बच्चे आज आत्मनिर्भर बन चुके हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में बेहतर काम कर रहे हैं। रिक्की का लक्ष्य है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों तक शिक्षा पहुंचे, ताकि वे अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें और सम्मानजनक जिंदगी जी सकें।

पढ़ाई की ओर बच्चों को आकर्षित करने की कोशिश

फिरोजाबाद से शुरू हुई 'छोटू की पाठशाला' आज देश के कई राज्यों तक पहुंच चुकी है। इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सोशल मीडिया ने भी अहम भूमिका निभाई है। संस्था के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लाखों लोग जुड़े हुए हैं, जबकि अकेले फेसबुक पर ही इसे 15 लाख से अधिक लोग फॉलो करते हैं।

रिक्की बताते हैं कि कई बार बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने के लिए वह उन्हें छोटे-छोटे उपहार या खाने की चीजें भी देते हैं। उनका कहना है कि अगर इससे बच्चे शिक्षा की ओर आकर्षित होते हैं, तो यह कोशिश सफल मानी जा सकती है।

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