ममता की तरह इंदिरा गांधी से भी छिनी थी पार्टी की कमान, फिर भी की धमाकेदार वापसी — 'दीदी' के लिए बड़ा सबक

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर बगावत और ममता बनर्जी के घटते नियंत्रण के बीच इंदिरा गांधी का दौर याद आता है, जिन्हें दो बार पार्टी से निकाला गया मगर उन्होंने जनता के भरोसे हर बार ताकतवर वापसी की। जानिए इस इतिहास से ममता के लिए क्या सीख निकलती है।

पश्चिम बंगाल की सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में फूट साफ नजर आने लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी पर पकड़ खोती दिख रही हैं। विधायक ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले बागी गुट ने विधानसभा में टीएमसी पर नियंत्रण का दावा ठोक दिया है और खुद को ही असली तृणमूल बता रहा है। संसद में भी ममता के कई करीबी सांसद इसी बागी खेमे में शामिल हो चुके हैं। यह संकट हूबहू वैसा ही है, जैसा कभी इंदिरा गांधी ने झेला था। इंदिरा को भी अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं के विरोध से जूझना पड़ा था। उन्हें दो बार पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया, लेकिन हर बार वे पहले से अधिक मजबूत होकर लौटीं।

सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को कमजोर क्यों आंका?

साल 1966 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के अचानक निधन के बाद देश में बड़ा सियासी शून्य पैदा हो गया। उस वक्त कांग्रेस के भीतर क्षेत्रीय क्षत्रपों का एक दमदार गुट सक्रिय था, जिसे सिंडिकेट कहा जाता था। इसमें के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष और बीजू पटनायक जैसे ताकतवर चेहरे शामिल थे। इन नेताओं को भरोसा था कि अनुभवी मोरारजी देसाई के मुकाबले इंदिरा गांधी को काबू में रखना आसान रहेगा। मोरारजी देसाई नेहरू सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे और मंझे हुए नेता माने जाते थे।

सिंडिकेट ने इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में मदद की, यह सोचकर कि वे उनके इशारों पर चलेंगी। लेकिन उनका यह अंदाजा पूरी तरह गलत निकला। पद संभालते ही इंदिरा गांधी ने अपने स्वतंत्र फैसले लेने शुरू कर दिए, जिससे पार्टी के पुराने धुरंधरों और प्रधानमंत्री के बीच टकराव की जमीन तैयार हो गई।

दोनों पक्षों के बीच जल्द ही सत्ता का खेल छिड़ गया। इंदिरा गांधी ने दो-टूक कह दिया कि वे किसी दबाव में काम नहीं करेंगी। उन्होंने पार्टी संगठन के बजाय सीधे जनता से जुड़ने की रणनीति अपनाई, जिससे सिंडिकेट के नेता असहज हो उठे। उन्हें लगने लगा कि सत्ता उनके हाथ से फिसल रही है, और यही वजह थी कि संगठन व सरकार के बीच की दरार लगातार चौड़ी होती गई।

1969 के राष्ट्रपति चुनाव ने कैसे कांग्रेस को दो हिस्सों में बांटा?

इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच की यह जंग साल 1969 में अपने चरम पर पहुंच गई। राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद नए राष्ट्रपति का चुनाव होना था। कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड ने इंदिरा की मर्जी के खिलाफ नीलम संजीव रेड्डी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इंदिरा इस फैसले से नाखुश थीं और उन्होंने तत्कालीन उपराष्ट्रपति वीवी गिरी को निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में आगे कर दिया।

इसके बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस सांसदों और विधायकों से अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने की अपील की। इस ऐतिहासिक मुकाबले में वीवी गिरी विजयी रहे, जिसने सिंडिकेट के अहंकार पर करारी चोट की। जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा ने नवंबर 1969 में इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब 'द ड्रामेटिक डिकेड' में लिखा है कि इस घटना ने कांग्रेस में औपचारिक विभाजन कर दिया। इसके बाद पार्टी दो धड़ों में बंट गई — एक कांग्रेस (आर) कहलाई और दूसरी कांग्रेस (ओ)। कांग्रेस (ओ) के पास पुराना संगठन था, जबकि कांग्रेस (आर) के पास इंदिरा गांधी का चेहरा। यह भारतीय राजनीति का बड़ा मोड़ साबित हुआ और इसने दिखा दिया कि एक मजबूत नेता पूरे संगठन को भी चुनौती दे सकता है।

संगठन के बजाय जनता का भरोसा चुनने का क्या नतीजा निकला?

पार्टी से निकाले जाने के बाद इंदिरा गांधी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने ही विरोधी नेताओं की वैधता को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया। प्रणब मुखर्जी के मुताबिक इंदिरा ने कहा था, 'यह जनता द्वारा लोकतांत्रिक रूप से चुने गए नेता के खिलाफ कुछ लोगों की कार्रवाई है।' शुरुआत में संसद में आंकड़े कांग्रेस (ओ) के पक्ष में दिख रहे थे, क्योंकि पुराने संगठन के पास अनुभवी नेता और मजबूत ढांचा था।

लेकिन इंदिरा गांधी के पास एक ऐसी पूंजी थी, जो सिंडिकेट के पास नहीं थी — जनता के बीच उनकी जबरदस्त लोकप्रियता। इस संकट के दौरान इंदिरा ने एक बड़ा वामपंथी झुकाव दिखाते हुए जुलाई 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस फैसले ने उन्हें गरीबों के मसीहा के तौर पर स्थापित कर दिया।

जीवनी लेखिका पुपुल जयकर ने लिखा है कि विभाजन के बाद इंदिरा ने सीपीआई और डीएमके के समर्थन से सरकार चलाई। विरोधी नेताओं ने उन्हें हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव भी लाया, मगर वह नाकाम रहा। साल 1971 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया और उनकी पार्टी ने प्रचंड जीत दर्ज की, जबकि सिंडिकेट हाशिए पर सिमट गया। जनता ने यह साबित कर दिया कि असली कांग्रेस वही है, जिसके साथ इंदिरा गांधी खड़ी हैं।

इमरजेंसी के बाद दूसरी बार पार्टी से बाहर होने पर वापसी कैसे हुई?

इंदिरा गांधी के जीवन का दूसरा बड़ा संकट साल 1977 में आया। इमरजेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी हार झेलनी पड़ी और खुद इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गईं। इस शिकस्त के बाद पार्टी के भीतर उनके खिलाफ असंतोष भड़क उठा और कई करीबी नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया। पुपुल जयकर के अनुसार इस धोखे से इंदिरा बेहद आहत थीं। उन्होंने कहा था, 'दुख एक घेरे की तरह आता है और इसे चटाई की तरह समेटा नहीं जा सकता।'

ब्रह्मानंद रेड्डी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को अलग-थलग करने की कोशिश की। उन्हें सामूहिक नेतृत्व का हिस्सा तक नहीं माना जा रहा था और स्थानीय संगठन उनके कार्यक्रमों से दूरी बना रहे थे। मगर इंदिरा गांधी ने एक बार फिर सीधे जनता का रुख किया। उन्होंने बिहार के बेलची गांव का दौरा किया, जहां बाढ़ प्रभावित इलाके में वे हाथी पर सवार होकर दलित पीड़ितों से मिलने पहुंचीं।

इस एक दौरे ने देश की राजनीति की दिशा बदल दी। जनता का भारी समर्थन देखकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश भर गया और लोगों को महसूस हुआ कि इंदिरा ही उनकी असली हितैषी हैं। इस तरह उन्होंने बिना किसी बड़े सांगठनिक सहारे के अपनी लोकप्रियता एक बार फिर साबित कर दी।

1978 के नेशनल कन्वेंशन ने कांग्रेस (आई) को असली कांग्रेस कैसे बनाया?

इंदिरा गांधी के समर्थक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जनवरी 1978 में नई दिल्ली में एक नेशनल कन्वेंशन आयोजित किया। इसमें हजारों एआईसीसी सदस्यों, सांसदों और विधायकों ने हिस्सा लिया और सर्वसम्मति से इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया। यह सीधे तौर पर ब्रह्मानंद रेड्डी के नेतृत्व को चुनौती थी, जिसके जवाब में आधिकारिक कांग्रेस ने इंदिरा को फिर से निष्कासित कर दिया।

नीरजा चौधरी की किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' के मुताबिक उस समय 54 सांसद इंदिरा गांधी के साथ गए। इस नए गुट को कांग्रेस (आई) नाम दिया गया, जहां 'आई' का मतलब इंदिरा था। यह बेहद जोखिम भरा कदम था, लेकिन इंदिरा का यह दांव भी सटीक बैठा। साल 1980 के चुनाव में कांग्रेस (आई) ने भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और विरोधी गुट धीरे-धीरे खत्म हो गया।

इतिहासकार राजमोहन गांधी ने लिखा है कि विरोधी भीड़ के सामने अडिग रहने की इंदिरा की क्षमता को कोई भी इतिहासकार नजरअंदाज नहीं कर सकता। इस दूसरी वापसी ने पूरी तरह साफ कर दिया कि भारतीय राजनीति में जनता का भरोसा ही सबसे बड़ी ताकत है। संगठन चाहे जितना बड़ा हो, वह जनता के नेता के सामने टिक नहीं सकता।

ममता के मौजूदा संकट और महाराष्ट्र की बगावत में क्या समानता है?

अब बात करें साल 2026 के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य की। ममता बनर्जी ने करीब तीन दशकों तक टीएमसी पर एकछत्र राज किया है। उन्होंने वामपंथियों को हराया और बीजेपी को भी कड़ी टक्कर दी, लेकिन आज उनकी ही पार्टी के भीतर बगावत खड़ी हो गई है। ऋतब्रत बनर्जी का यह विद्रोह महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजित पवार की बगावत की याद दिलाता है।

साल 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी। शिंदे के पास विधायकों का बहुमत था, जिसके दम पर उन्होंने न सिर्फ सरकार बनाई बल्कि शिवसेना का नाम और चुनाव चिह्न भी हासिल कर लिया। इसके एक साल बाद अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ ठीक वैसी ही बगावत की।

भारतीय राजनीति का यह नया रुझान बताता है कि अब सिर्फ विरासत या नाम काफी नहीं है। पार्टी पर नियंत्रण के लिए विधायी बहुमत यानी नंबर गेम सबसे अहम हो गया है। ममता बनर्जी के सामने भी आज यही कानूनी और राजनीतिक चुनौती खड़ी है, क्योंकि उनके अपने ही सांसद और विधायक पाला बदल रहे हैं। काकोली घोष दस्तीदार जैसी वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अब चुनाव आयोग ही तय करेगा कि असली टीएमसी कौन है। यह हालात ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं।

क्या ममता भी इंदिरा की तरह पार्टी को फिर खड़ा कर पाएंगी?

ममता बनर्जी और इंदिरा गांधी के संकट में कई समानताओं के बावजूद कुछ बुनियादी फर्क भी हैं। 1960 और 1970 के दशक की कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी थी, जिसका पूरे देश में सांगठनिक ढांचा था, जबकि टीएमसी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक सीमित एक क्षेत्रीय दल है। इंदिरा गांधी एक राष्ट्रीय नेता थीं, जिनके पास पूरे देश को प्रभावित करने वाला एजेंडा था। वहीं ममता बनर्जी की ताकत उनकी जुझारू छवि और जनता से सीधा जुड़ाव रही है।

टीएमसी का जन्म भी साल 1998 में कांग्रेस से बगावत के बाद हुआ था और ममता ने खुद एक बागी के रूप में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की थी। आज इतिहास खुद को दोहरा रहा है, और उनके अपने ही साथी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। अगर ममता बनर्जी को इस संकट से उबरना है, तो उन्हें भी संगठन के बजाय सीधे जनता की अदालत में जाना होगा। इंदिरा गांधी का इतिहास यही सिखाता है कि पार्टी खोने का मतलब हमेशा जनता को खोना नहीं होता।

https://hindi.news18.com/news/nation/mamata-banerjee-tmc-revolt-how-india-gandhi-faced-and-won-twice-lessons-from-history-10564012.html