जर्मनी की जीत के लिए 20 साल जमीन में दबाए रखी 'स्कॉच' की बोतल, असम के इस फैन की दीवानगी इंटरनेट पर छाई!

असम के दीफू शहर के पुतुल डेका, जिन्हें लोग 'पुतुल जर्मन' कहते हैं, ने जर्मनी की वर्ल्ड कप जीत के लिए साढ़े चार लाख जैसी कसम निभाते हुए 20 साल तक स्कॉच की बोतल जमीन में दफन रखी और अब अपने घर को 'जर्मन स्टेडियम' में बदल दिया है।

फुटबॉल का जुनून किस हद तक जा सकता है, इसकी मिसाल है भारत के एक सच्चे फैन की यह कहानी। इसमें दीवानगी इतनी गहरी है कि कई बार यह पागलपन जैसी लग सकती है। इस बार इस फैन ने अपने घर को ही पूरे फुटबॉल स्टेडियम में तब्दील कर दिया है।

यह कहानी पुतुल की है। फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा है कि लोग उन्हें 'पुतुल जर्मन' के नाम से बुलाने लगे हैं। बात साल 1994 की है, जब फुटबॉल वर्ल्ड कप का क्वार्टर फाइनल खेला जा रहा था। बुल्गारिया ने जैसे ही जर्मनी को हराकर टूर्नामेंट से बाहर किया, असम में बैठे इस शख्स का दिल टूट गया। उसी पल गुस्से और जज्बात में उन्होंने 'पासपोर्ट स्कॉच' की एक महंगी बोतल खरीदी और कसम खाई कि जब तक उनकी पसंदीदा टीम जर्मनी दोबारा वर्ल्ड कप नहीं जीत लेती, इस बोतल को कोई हाथ नहीं लगाएगा। इसके बाद उन्होंने अपने घर का आंगन खोदकर वह बोतल जमीन के नीचे दफन कर दी।

आज जब दुनिया भर में फुटबॉल वर्ल्ड कप की धूम मच चुकी है, असम के कार्बी आंगलोंग जिले के 'दीफू' शहर से आई यह कहानी इंटरनेट पर खूब चर्चा बटोर रही है। पुतुल साल 1986 से लगातार हर वर्ल्ड कप को किसी त्योहार की तरह मनाते आ रहे हैं और इस बार वे लगातार 11वीं बार अपने घर पर वर्ल्ड कप की लाइव स्क्रीनिंग की मेजबानी कर रहे हैं।

20 साल का इंतजार और 2014 की ऐतिहासिक खुदाई

इस कहानी की शुरुआत भले एक टूटे दिल से हुई हो, लेकिन इसका अंत बेहद शानदार रहा। साल 1994 में जमीन में गाड़ी गई वह बोतल एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे 20 साल तक मिट्टी के नीचे दबी रही। इस दौरान 1998, 2002 (जहां जर्मनी फाइनल में हारा), 2006 और 2010 के वर्ल्ड कप आए और चले गए। हर बार पुतुल की उम्मीद जगती, लेकिन जश्न टलता रहा।

आखिरकार वह घड़ी आ ही गई। साल 2014 में मारियो गोत्जे के एक्स्ट्रा टाइम गोल की बदौलत जर्मनी ने अर्जेंटीना को हराकर चौथी बार वर्ल्ड कप जीता, तो दीफू शहर में पुतुल के घर के आंगन की खुदाई शुरू हुई। पुतुल ने 20 साल पुरानी वह स्कॉच की बोतल बाहर निकाली और अपनी कसम पूरी की। इस एक वाकये ने उन्हें रातों-रात भारतीय फुटबॉल फैंस के बीच एक 'लिविंग लेजेंड' बना दिया।

1986 का वो पहला प्यार, जिसने नाम ही बदल दिया

पुतुल डेका को आज उनके असली नाम से कम और 'पुतुल जर्मन' के नाम से ज्यादा पहचाना जाता है। उनकी यह दीवानगी साल 1986 के वर्ल्ड कप से शुरू हुई थी, जब उन्होंने वेस्ट जर्मनी की टीम को खेलते देखा और उसके मुरीद बन गए। फुटबॉल में अक्सर फैंस अपनी टीमें बदलते रहते हैं, मगर पुतुल की वफादारी पिछले 11 वर्ल्ड कप से लेकर आज तक नहीं डगमगाई। जर्मनी जीते या हारे, उनका दिल सिर्फ अपनी 'मानशाफ्ट' यानी जर्मन टीम के लिए धड़कता है।

घर का आंगन बन गया 'जर्मन स्टेडियम'

एक सच्चे फैन की दीवानगी सिर्फ कसम खाने तक सीमित नहीं रहती। पुतुल ने अपनी इस दीवानगी को पूरे शहर का त्योहार बना दिया है। उन्होंने अपने घर के आंगन को एक बाकायदा फुटबॉल देखने वाले एरिना में बदल दिया है, जिसे लोग प्यार से 'जर्मन स्टेडियम' कहते हैं। वर्ल्ड कप के मैचों के लिए यहां बड़ी स्क्रीन्स लगाई गई हैं, हिस्सा लेने वाले देशों के झंडे लहरा रहे हैं और चारों ओर फुटबॉल के दिग्गजों के पोस्टर सजे हैं। इस बार पुतुल ने असम के मशहूर सिंगर और फुटबॉल प्रेमी जुबीन गर्ग को भी अपनी सजावट के जरिए एक खास श्रद्धांजलि दी है।

ओपनिंग नाइट: 250 मेहमान और पूरी-सब्जी का लंगर

वर्ल्ड कप की ओपनिंग नाइट पर पुतुल के इस 'जर्मन स्टेडियम' में जश्न का माहौल बिल्कुल अलग ही स्तर पर पहुंच गया। मेहमानों की एंट्री शाम 6:30 बजे रखी गई थी। शाम को एक पूर्व नेशनल फुटबॉलर मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे। फैंस के सामने 4 फीट ऊंची वर्ल्ड कप की एक चमचमाती नकली ट्रॉफी का अनावरण हुआ और फिर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू हुआ।

रात 8:30 बजे दावत का दौर शुरू हुआ। फुटबॉल के इस महाकुंभ में पेट-पूजा का भी पूरा इंतजाम था। पुतुल के घर आमंत्रित किए गए करीब 250 मेहमानों के लिए गरमा-गरम पूरी-सब्जी का लंगर शुरू हो चुका था।

रात 10:30 बजे जैसे ही टीवी स्क्रीन पर वर्ल्ड कप की पहली सीटी सन्नाटे को चीरती हुई गूंजी, पूरी-सब्जी खा रहे फैंस अपनी जर्सी संभालकर स्क्रीन के सामने जम गए।

पुतुल जर्मन की यह कहानी बताती है कि फुटबॉल महज 90 मिनट का खेल नहीं है। यह एक ऐसा नशा है, जिसके लिए कोई इंसान 20 साल तक स्कॉच की बोतल जमीन में गाड़ सकता है और अपने घर को पूरे शहर का स्टेडियम बना सकता है।

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