कुछ फिल्में अपनी मंजिल के लिए नहीं, बल्कि उस रास्ते के लिए याद रखी जाती हैं जो वे तय करती हैं। ‘हीर सारा’ भी ठीक ऐसी ही एक फिल्म है, जो दो औरतों के सफर को बहाना बनाकर आजादी, दोस्ती और खुद की तलाश की बात करती है। इसके रास्ते लंबे हैं, नजारे मनमोहक हैं और नीयत साफ है, लेकिन जब सफर थमता है तो महसूस होता है कि कहानी दिल पर वैसी गहरी छाप नहीं छोड़ पाई, जैसी उससे उम्मीद की गई थी।
फिल्म एक नजर में
रेटिंग 2.5/5 के साथ रिलीज हुई यह कॉमेडी-ड्रामा हिंदी में 1 घंटा 40 मिनट की है और 12 जून 2026 को आई है। इसमें पत्रलेखा, मानवी गागरू, आरिफ जकारिया, श्वेता साल्वे और निशांक वर्मा मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म का निर्देशन कार्तिक चौधरी ने किया है, जबकि संगीत अर्जुन अय्यर का है।
एक सफर जो खुद से मुलाकात कराता है
सिनेमा की भाषा में ‘रोड ट्रिप’ महज एक यात्रा नहीं, बल्कि खुद से मिलने का जरिया मानी जाती है। जब कोई गाड़ी की चाबी घुमाकर हाईवे पर निकलता है, तो वह सिर्फ किलोमीटर नहीं नापता, बल्कि अपने भीतर दबे किसी दर्द या अधूरी ख्वाहिश के पीछे भाग रहा होता है। लेखक-निर्देशक कार्तिक चौधरी की ‘हीर सारा’ भी इसी वादे के साथ पर्दे पर शुरू होती है। दो बिल्कुल जुदा स्वभाव की लड़कियां, एक भारी-भरकम बुलेट और इंदौर से पोंडिचेरी तक फैली खुली सड़कें — इस सफर में मनोरंजन का हर गियर मौजूद है, मगर अफसोस कि फिल्म मंजिल तक पहुंचने से पहले ही न्यूट्रल पड़ जाती है।
विजुअल्स में दम, पर लेखन में कमी
कार्तिक चौधरी ने जो कहानी का ताना-बाना बुना है, वह कोई नया नहीं है। शुरुआत थोड़ी सुस्त है, जहां किरदारों के ‘इमोशनल बैगेज’ को समझाने में जरूरत से ज्यादा समय खर्च कर दिया गया है। लेकिन जैसे ही बुलेट हाईवे पर रफ्तार पकड़ती है, फिल्म भी अपना गियर बदल लेती है। यह सिर्फ टाइमपास नहीं करती, बल्कि उन नजरों पर भी सवाल खड़ा करती है, जो हाईवे पर अकेली लड़की को भारी बाइक चलाते देख अजीब कयास लगाने लगती हैं।
लड़कियों को ‘सलीके’ से रहने और सही वक्त पर शादी कर लेने का जो पुराना सामाजिक दबाव है, उसकी सीटी भी फिल्म में रुक-रुककर बजती रहती है। दिक्कत बस इतनी है कि निर्देशक इन गंभीर मुद्दों को छूकर आगे निकल जाते हैं और उनकी गहराई में उतरने का जोखिम नहीं उठाते। रोड ट्रिप फिल्मों की असली जान उनकी अनिश्चितता होती है, मगर यहां कहानी इतनी सीधी चलती है कि पॉपकॉर्न चबाते हुए ही आप अंदाजा लगा लेते हैं कि अगले टोल नाके पर क्या होने वाला है। जब सब कुछ पहले से तय लगने लगे, तो सफर का रोमांच आधा रह जाता है।
पत्रलेखा का ठहराव, मानवी का स्पार्क
अगर किसी चीज ने फिल्म को डगमगाने से बचाया है, तो वह है दोनों लीड अभिनेत्रियों की जुगलबंदी। पत्रलेखा ने सारा के किरदार में गजब का ठहराव और दर्द उतारा है। उनकी आंखों में मां को ढूंढ़ने की बेचैनी साफ झलकती है। अपनी ‘सोलो राइडिंग कंपनी’ खोलने का सपना देखने वाली इस लड़की की जिद को पत्रलेखा ने बिना किसी शोर-शराबे के बेहद संयम से पेश किया है।
दूसरी ओर, मानवी गागरू इस सफर में ‘एनर्जी ड्रिंक’ की तरह असर करती हैं। जब-जब फिल्म अपनी धीमी चाल से उबाने लगती है, मानवी अपनी शानदार कॉमिक टाइमिंग और बेबाक संवादों से स्क्रीन में जान फूंक देती हैं। उनका यह बिंदास अंदाज कई जगह इम्तियाज अली की ‘जब वी मेट’ की ‘गीत’ की याद दिला देता है। बाकी सहायक किरदारों के पास करने को खास कुछ नहीं था, इसलिए वे महज फ्रेम भरने भर के काम आए।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी दो ऐसी लड़कियों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी-अपनी जिंदगी की उलझनों को सुलझाने के लिए एक अनजान सफर पर निकल पड़ती हैं। सारा (पत्रलेखा) इंदौर में अपने पिता (आरिफ जकारिया) के साथ रहती है। दोनों के बीच एक अजीब-सी खामोशी और फासला है। सारा के मन में बचपन का एक ऐसा जख्म है जो आज भी हरा है — जब वह महज दस साल की थी, तब उसकी मां (श्वेता साल्वे) उसे छोड़कर चली गई थी। मां की यादों का सहारा उसे सिर्फ उस पुरानी मोटरसाइकिल में मिलता है, जिसे कभी उसकी मां चलाया करती थी।
एक दिन सारा को कुछ ऐसे सुराग हाथ लगते हैं, जिनसे पता चलता है कि उसकी मां पोंडिचेरी में हो सकती है। वह बिना ज्यादा सोचे मां की वही बाइक उठाती है और इंदौर से पोंडिचेरी के लंबे सफर पर निकल पड़ती है। सफर की शुरुआत में ही उसकी मुलाकात हीर (मानवी गागरू) से होती है। हीर एक अमीर, बिंदास और थोड़े चुलबुले मिजाज की लड़की है, जिसमें बड़े शहर की रईसी का अंदाज है। उसके पोंडिचेरी जाने की वजह बिल्कुल अलग है — उसे वहां जाकर अपने बॉयफ्रेंड तन्मय (निशांक वर्मा) की शादी रुकवानी है। दो विपरीत स्वभाव की अजनबी लड़कियां एक ही मोटरसाइकिल पर सवार होती हैं और यहीं से ‘हीर-सारा’ का वह सफर शुरू होता है, जो उन्हें सिर्फ पोंडिचेरी ही नहीं, बल्कि दोस्ती, हीलिंग और खुद को पहचानने के एक नए रास्ते पर भी ले आता है।
सफर ठीकठाक, बस मंजिल थोड़ी फीकी
कुल मिलाकर ‘हीर सारा’ एक ऐसी संडे-वॉच फिल्म है, जिसे आप चाय की चुस्कियों के साथ आराम से देख सकते हैं। यह दो लड़कियों की दोस्ती, उनके आपसी अपनेपन और खूबसूरत रास्तों की एक प्यारी-सी रील है। पत्रलेखा और मानवी का अभिनय आपका दिल जीत लेगा, लेकिन अगर आप इस सफर से किसी बहुत बड़े लाइफ-चेंजिंग अनुभव या गहरे इमोशन की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो पोंडिचेरी पहुंचते-पहुंचते शायद आपको थोड़ा खालीपन महसूस हो। संक्षेप में कहें तो सफर ठीकठाक है, बस मंजिल थोड़ी फीकी रह गई।
https://hindi.news18.com/news/entertainment/film-review-heer-sara-movie-review-patralekhaa-and-maanvi-gagroo-film-that-races-along-yet-fails-to-leave-lasting-impression-on-heart-10562708.html