वैशाली जिले के मधुरापुर गांव में आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत लिखी जा रही है। कभी घर की चारदीवारी तक सिमटी रहने वाली ग्रामीण महिलाएं अब आर्थिक सशक्तिकरण की मिसाल बन गई हैं। यहां महिला दुग्ध उत्पादक सहयोग समिति से जुड़ी महिलाएं डेयरी उद्योग के जरिए अपनी आमदनी तो बढ़ा ही रही हैं, साथ ही पूरे गांव में बदलाव की बयार भी ला रही हैं।
दूध संग्रह केंद्र से शुरू होती है सुबह
मधुरापुर गांव की सुबह अब दूध संग्रह केंद्र की चहल-पहल के साथ शुरू होती है। हर रोज सुबह महिलाएं हाथों में दूध के बर्तन लिए केंद्र पर पहुंचती हैं और समिति के माध्यम से अपने पशुओं का दूध बाजार तक पहुंचाती हैं। खास बात यह है कि इस पूरी व्यवस्था और प्रबंधन की कमान पूरी तरह महिलाओं के ही हाथों में है।
घरेलू काम बना परिवार की आर्थिक रीढ़
समिति से जुड़ीं स्थानीय महिला सुमन देवी बताती हैं कि पहले पशुपालन को महज घरेलू कामकाज का हिस्सा समझा जाता था, लेकिन अब यही काम परिवार की बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है। दूध की बिक्री से हर महीने मिलने वाली तय आमदनी से घर के खर्च में काफी मदद मिल रही है।
इस नियमित कमाई के सहारे महिलाएं अब बच्चों की बेहतर पढ़ाई से लेकर घर की दूसरी जरूरी आवश्यकताओं को भी आसानी से पूरा कर पा रही हैं।
संगठित प्रयास से मिला उचित दाम और पहचान
महिला दुग्ध उत्पादक समिति ने गांव की महिलाओं को एक ऐसा मंच मुहैया कराया है, जहां वे आपसी सहयोग के बल पर आगे बढ़ रही हैं। केंद्र पर दूध की गुणवत्ता यानी फैट की जांच, संग्रह और बिक्री की पूरी प्रक्रिया बेहद पारदर्शी और व्यवस्थित ढंग से संचालित होती है।
महिलाओं का कहना है कि पहले उन्हें दूध का सही मूल्य नहीं मिल पाता था, लेकिन संगठित होकर काम करने के बाद अब उन्हें अपनी मेहनत का उचित दाम मिल रहा है और समाज में एक नई पहचान भी बन रही है।
पशुओं की सेहत और उत्पादन पर खास ध्यान
डेयरी से जुड़ने के बाद महिलाएं अब परंपरागत तरीकों से आगे बढ़कर पशुओं के चारे, उनके स्वास्थ्य और समुचित देखभाल पर भी विशेष ध्यान दे रही हैं। वैज्ञानिक और व्यवस्थित पद्धतियों को अपनाने से क्षेत्र में दूध उत्पादन की क्षमता में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
ग्रामीण बदलाव की जीवंत तस्वीर
स्थानीय प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि मधुरापुर में चल रही यह महिला डेयरी समिति ग्रामीण विकास और बदलाव की एक जीती-जागती मिसाल है। यह पहल केवल दूध उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का बड़ा माध्यम बन चुकी है।
मधुरापुर की यह कामयाबी इस बात की गवाह है कि अगर सही अवसर और सहयोग मिले, तो ग्रामीण महिलाएं भी किसी भी क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का परचम बुलंद कर सकती हैं।
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