राजस्थानी लोकसंगीत की दुनिया में मांड गायकी की पहचान बन चुकीं स्वर साधिका गवरी देवी का 98 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके जाने की खबर से लोकसंगीत प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है। अपनी मधुर और सुरीली आवाज से उन्होंने राजस्थानी लोकगीतों को एक नई पहचान और सम्मान दिलाया।
बाड़मेर में जन्म, पाली बनी कर्मभूमि
गवरी देवी का जन्म बाड़मेर जिले के कोरण गांव में हुआ था। विवाह के बाद उन्होंने पाली को अपनी कर्मभूमि बनाया और यहीं से अपनी संगीत यात्रा को आगे बढ़ाया। देशभर के मंचों पर उन्होंने एक से बढ़कर एक यादगार प्रस्तुतियां दीं, जिन्होंने श्रोताओं के मन में गहरी छाप छोड़ी।
'केसरिया बालम' से मिली देशव्यापी ख्याति
मांड गायकी में उनकी पकड़ ऐसी थी कि 'केसरिया बालम' जैसी प्रस्तुति से उन्होंने पूरे देश में अपनी अलग पहचान कायम की। उनकी आवाज राजस्थानी संस्कृति और परंपरा की जीवंत मिसाल बन गई।
लोककला के प्रचार में अहम भूमिका
अपने पति मिश्रीलाल राव के साथ मिलकर गवरी देवी ने लोककला के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दोनों ने मिलकर राजस्थानी लोकसंगीत को आगे बढ़ाने में अपना जीवन समर्पित किया।
आगे बढ़ रही संगीत विरासत
गवरी देवी की संगीत परंपरा को उनका परिवार आज भी आगे बढ़ा रहा है। उनकी बहू सुंदरदेवी और पोतियां गंगा तथा नीतू उनकी इस समृद्ध विरासत को संभाल रही हैं। अपने पीछे वे एक समृद्ध सांस्कृतिक और पारिवारिक धरोहर छोड़ गई हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
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