ईरान और अमेरिका के बीच मुमकिन माने जा रहे समझौते को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का एक ताजा बयान पाकिस्तान की भूमिका पर नई बहस छेड़ गया है। बीते कई महीनों से इस्लामाबाद खुद को इस संकट का अहम मध्यस्थ बताकर पेश कर रहा था, लेकिन अब ट्रंप का कहना है कि यदि समझौता हुआ तो अगले वीकेंड तक उस पर यूरोप में दस्तखत हो सकते हैं। इसी से यह सवाल उठने लगा है कि क्या पाकिस्तान का इस्तेमाल सिर्फ बैकचैनल और मध्यस्थता तक सीमित रखा गया और जब इतिहास में नाम लिखाने की घड़ी आई तो उसे किनारे कर दिया गया।
ट्रंप ने आखिर कहा क्या
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को ईरान पर प्रस्तावित सैन्य कार्रवाई रोकने की घोषणा करते हुए दावा किया कि युद्ध को खत्म करने वाला समझौता लगभग बनकर तैयार है। उन्होंने बताया कि दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जा रहा है और आने वाले कुछ दिनों में उन पर हस्ताक्षर संभव हैं।
व्हाइट हाउस में उन्होंने कहा, ‘हमने ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने वाला बेहतरीन समझौता किया है। दस्तावेजों को अंतिम रूप दिया जाना अभी बाकी है। यह अगले कुछ दिनों में पूरा हो सकता है।’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘मुमकिन है कि इसी सप्ताहांत यूरोप में हस्ताक्षर हों।’ ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वह खुद शायद इसमें शामिल न हों, मगर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर वहां मौजूद रह सकते हैं।
नाम तो लिया, पर पूरी इज्जत नहीं मिली
अपने ट्रुथ सोशल पोस्ट में ट्रंप ने दावा किया कि समझौते के मुख्य बिंदुओं को अमेरिका, इजरायल, सऊदी अरब, यूएई, कतर, तुर्किए, पाकिस्तान, बहरीन, कुवैत, जॉर्डन और मिस्र समेत कई देशों ने स्वीकृति दी है। यानी जिन देशों ने बातचीत की प्रक्रिया में हिस्सा लिया या समर्थन दिया, उनमें पाकिस्तान का नाम भी था। लेकिन जैसे ही हस्ताक्षर की बारी आई, ट्रंप ने पाकिस्तान के बजाय यूरोप का जिक्र किया। यहीं से कूटनीतिक और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि कहीं पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान का इस्तेमाल केवल काम निकलवाने के लिए तो नहीं किया गया।
पाकिस्तान की भूमिका कितनी रही
28 फरवरी को अमेरिका ने ईरान पर हमला बोला था और अप्रैल में दोनों देशों के बीच सीजफायर हो गया। बीते महीनों में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संपर्क का सिलसिला बनाए रखने में भूमिका निभाई। बातचीत के अलग-अलग दौर और संदेशों के आदान-प्रदान में पाकिस्तान का नाम लगातार सामने आता रहा। इस्लामाबाद ने दोनों देशों की एक बैठक भी कराई, जिसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तक पहुंचे थे। ट्रंप ने भी अपने बयान में पाकिस्तान को समझौते का समर्थन करने वाले देशों की सूची में रखा। मगर अब संभावित हस्ताक्षर समारोह यूरोप में कराए जाने की बात सामने आते ही पाकिस्तान को मिलने वाली कूटनीतिक वाहवाही पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
ईरान ने डील से बनाई दूरी
ट्रंप के दावे के कुछ ही घंटों के भीतर ईरान ने पूरी तस्वीर पलट दी। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि अभी किसी अंतिम समझौते पर मुहर नहीं लगी है। उनके मुताबिक बातचीत के मसौदे का बड़ा हिस्सा तैयार है, मगर ईरान अपनी ‘रेड लाइन्स’ पर कोई समझौता नहीं करेगा।
इजरायल भी हक्का-बक्का
अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप के ऐलान से पहले इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को इसकी कोई भनक तक नहीं दी गई थी। रिपोर्ट में बताया गया कि ट्रंप की घोषणा से नेतन्याहू दंग रह गए। बाद में एक वरिष्ठ इजरायली अधिकारी ने चैनल 12 न्यूज को बताया कि इजरायल को किसी अंतिम समझौते की जानकारी नहीं है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समझौता अब तक हुआ ही नहीं, तो यूरोप में संभावित साइनिंग की घोषणा आखिर कितनी पुख्ता है।
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