छत्तीसगढ़ के गांवों में गोबर अब सिर्फ पारंपरिक इस्तेमाल की चीज नहीं रहा, बल्कि महिलाओं के लिए कमाई का एक भरोसेमंद जरिया बनता जा रहा है। बालोद जिले के बघमरा गांव में चल रहे जय कपिलेश्वर स्वयं सहायता समूह की महिलाएं गोबर से कंडे बनाकर आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर तेजी से आगे बढ़ रही हैं।
रायपुर की संस्था से मिला बड़ा ऑर्डर
समूह की सदस्य तीजन बाई देवांगन ने बताया कि उनके महिला समूह को रायपुर की एक संस्था से गोबर के कंडे तैयार करने का करीब 6 लाख रुपये का बड़ा ऑर्डर हासिल हुआ है। इस काम से समूह की महिलाओं को जहां रोजगार मिल रहा है, वहीं अच्छी आमदनी भी हो रही है।
उन्होंने बताया कि इस काम से समूह की कुल 24 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। ये महिलाएं गांव के गौठान, सड़कों के किनारे और खेतों के आसपास घूमने वाले मवेशियों का गोबर इकट्ठा करती हैं। इसके बाद गोबर को तय जगह पर लाकर एक खास प्रक्रिया के जरिए कंडे बनाए जाते हैं।
एक बार में 50 कंडे तैयार
समूह को ऐसे सांचे मुहैया कराए गए हैं, जिनसे एक बार में करीब 50 गोबर के कंडे बनाए जा सकते हैं। इससे कम समय में ज्यादा उत्पादन संभव हो पाता है।
लगातार बढ़ रही मांग
महिलाएं पहले जमीन पर पॉलीथिन बिछाती हैं और फिर सांचे में गोबर भरकर कंडों को आकार देती हैं। तैयार कंडों को धूप में अच्छी तरह सुखाया जाता है ताकि उनमें कोई नमी न रह जाए। सूखने के बाद इन कंडों की झिल्ली पैकिंग की जाती है और फिर इन्हें ऑर्डर देने वाली संस्था तक भेज दिया जाता है।
समूह की महिलाओं का कहना है कि इस काम में लागत अपेक्षाकृत कम आती है, जबकि इसकी मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
कहां होता है कंडों का इस्तेमाल
तीजन बाई ने आगे बताया कि फिलहाल मिले 6 लाख रुपये के ऑर्डर के तहत बड़ी मात्रा में गोबर के कंडे तैयार किए जा रहे हैं। इन कंडों का इस्तेमाल मुख्य रूप से पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों, हवन और तरह-तरह के आध्यात्मिक कार्यक्रमों में किया जाता है। पर्यावरण के अनुकूल होने की वजह से भी इनकी मांग बढ़ रही है।
ग्रामीण महिलाओं की यह कोशिश बताती है कि अगर स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल किया जाए, तो गोबर जैसी आम चीज भी बड़े कारोबार की बुनियाद बन सकती है।
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