समुद्री रास्ते से होने वाले वैश्विक व्यापार को लेकर इन दिनों ईरान का ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ सबसे संवेदनशील ठिकाना माना जा रहा है, लेकिन अब लाल सागर का एक चोकप्वाइंट दुनिया की चिंता बढ़ा रहा है। बदलते वैश्विक हालात के बीच यह इलाका एक खतरनाक फ्लैशप्वाइंट में तब्दील हो चुका है। यहां सिर्फ जहाजों की आवाजाही ही दांव पर नहीं है, बल्कि दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों — अमेरिका और चीन — की सेनाएं बिल्कुल आमने-सामने तैनात हैं, और बीते कुछ महीनों में इनके बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है।
आखिर कहां आमने-सामने हैं चीन और अमेरिका?
यह चोक प्वाइंट ‘बाब-अल-मंडेब’ और अफ्रीकी देश जिबूती की जमीन से जुड़ा है, जिसकी कुल चौड़ाई लगभग 30 किलोमीटर है। इसकी भौगोलिक बनावट की एक खास बात यह है कि इसके बीचोंबीच ‘पेरिम’ नाम का एक टापू मौजूद है, जिसकी वजह से यह समुद्री रास्ता दो हिस्सों में बंट जाता है।
- पूर्वी चैनल (बाब इस्केंडर): यह यमन के तट की ओर है और महज 3 किलोमीटर चौड़ा है। इसकी गहराई बहुत कम है, यानी यह काफी उथला है।
- पश्चिमी चैनल (डैक्ट-एल-मायून): यह जिबूती की ओर है और लगभग 26 किलोमीटर चौड़ा है। काफी गहरा होने की वजह से दुनिया के बड़े-बड़े कमर्शियल कंटेनर जहाज और तेल के टैंकर इसी पश्चिमी रास्ते से गुजरते हैं।
जिबूती की रणनीतिक लोकेशन
यह चोक प्वाइंट जिबूती में स्थित है, जो पूर्वी अफ्रीका में बसा एक बहुत छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम देश है। इसे ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ भी कहा जाता है। यह ठीक उस जगह बसा है जहां लाल सागर खत्म होता है और अदन की खाड़ी शुरू होती है। दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक ‘बाब-एल-मंडेब’ के मुहाने पर बैठा यह देश छोटा और बंजर होने के बावजूद, अपनी इसी खास स्थिति के कारण अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियों के सैन्य ठिकानों का गढ़ बन चुका है।
रेत, नमक और बंजर जमीन से शुरू हुआ सफर
जब साल 1977 में जिबूती को फ्रांस से आजादी मिली थी, तब इस छोटे से देश के पास अपनी कोई सेना तक नहीं थी। हालत यह थी कि पूरे देश में खेती के लिहाज से एक वर्ग मील से भी कम उपजाऊ जमीन मौजूद थी। संसाधन के नाम पर इस सूखे और बंजर देश के पास सिर्फ रेत, नमक और लगभग 20,000 ऊंट थे।
ऐसे हालात में जिबूती ने अपनी संप्रभुता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फ्रांस के साथ एक बड़ा समझौता किया। इस सौदे के तहत फ्रांस को जिबूती की धरती पर अपना सैन्य ठिकाना बनाए रखने की इजाजत दी गई और बदले में फ्रांस ने जिबूती को सुरक्षा की गारंटी और आर्थिक मदद का भरोसा दिया। यहीं से जिबूती को यह बात समझ आ गई कि उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी जमीन और उसकी भौगोलिक स्थिति है।
तेजी से पहुंचा अमेरिका
जिबूती ने अपनी इस रणनीतिक लोकेशन का खुलकर फायदा उठाना शुरू किया। साल 2001 में अमेरिका पर हुए 9/11 के आतंकी हमलों के ठीक तीन महीने बाद वाशिंगटन ने जिबूती से संपर्क साधा। अमेरिका इस क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ जंग और लाल सागर के व्यापारिक रूट की सुरक्षा के लिए एक पक्का ठिकाना चाहता था। उसने जिबूती में सैन्य बेस बनाने की इजाजत मांगी और जिबूती ने फौरन हामी भर दी। आज ‘कैंप लेमोनियर’ पूरे अफ्रीकी महाद्वीप पर अमेरिका का इकलौता स्थायी सैन्य ठिकाना है।
इसके बाद तो जैसे जिबूती में विदेशी सेनाओं की कतार लग गई। साल 2011 में जापान ने यहां अपना बेस बनाया, तो वहीं 2013 में इटली ने भी अपनी सैन्य छावनी खड़ी कर दी। इसके अलावा स्पेन और जर्मनी जैसे देशों की सेनाएं भी यहां मौजूद हैं।
दुनिया की इकलौती जगह जहां चीन-अमेरिका आमने-सामने
दुनिया का नियम है कि जब एक महाशक्ति कहीं अपने पैर जमाती है, तो उसका प्रतिद्वंद्वी भी ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह पाता। साल 2016 में जिबूती ने एक चौंकाने वाला ऐलान किया कि वह चीन के साथ बातचीत कर रहा है। इसके बाद साल 2017 में चीन ने जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य ठिकाना खोल दिया।
हालांकि चीन का दावा है कि वह वहां सिर्फ समुद्री लुटेरों से निपटने के लिए मौजूद है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है। चीनी बेस पर एक बेहद गहरा और विशालकाय डॉकयार्ड बनाया गया है, जो इतना बड़ा है कि वहां चीन के बड़े विमानवाहक पोत और परमाणु पनडुब्बियां आसानी से तैनात की जा सकती हैं। यही वजह है कि आज जिबूती पूरी धरती पर इकलौता ऐसा स्थान है, जहां दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी — अमेरिका और चीन — के सैन्य ठिकाने महज कुछ मील की दूरी पर आमने-सामने डटे हुए हैं।
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