'युवराज के चक्की पीसने के दिन आ गए हैं', निलंबित तृणमूल नेता रिजू दत्ता का अभिषेक बनर्जी पर तीखा प्रहार

तृणमूल कांग्रेस से निलंबित नेता रिजू दत्ता ने अभिषेक बनर्जी पर पार्टी को कमजोर करने और वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने टीएमसी और कांग्रेस के संभावित विलय को भी कानूनी और व्यावहारिक रूप से मुश्किल बताया।

कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस से निलंबित किए गए नेता रिजू दत्ता ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी पर जोरदार निशाना साधा है। महाभारत का संदर्भ देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी ने धृतराष्ट्र की भांति आंखें मूंदकर अभिषेक बनर्जी का साथ दिया, जिसका खामियाजा पूरी पार्टी को भुगतना पड़ा। एक समाचार एजेंसी से बातचीत में दत्ता ने कहा कि 'युवराज के अब चक्की पीसने का समय आ गया है।' उन्होंने इशारा किया कि आने वाले दिनों में अभिषेक बनर्जी को गंभीर कानूनी पचड़ों का सामना करना पड़ सकता है।

'संगठन में सिर्फ चापलूसी की चली'

दत्ता का कहना है कि अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया गया, निष्ठावान कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया गया और संगठन के भीतर ऐसा माहौल तैयार हुआ, जिसमें केवल चापलूसी करने वालों को तरजीह मिली। उन्होंने बताया कि सांसद कल्याण बनर्जी बरसों तक ममता बनर्जी के साथ खड़े रहे, मगर कई तजुर्बेकार नेताओं को दरकिनार कर एक ऐसे शख्स को राजनीति में आगे बढ़ाया गया, जो उनके अनुसार पार्षद बनने लायक भी नहीं था।

'सांसदों-विधायकों तक का सम्मान नहीं रखा'

निलंबित नेता ने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने वर्षों तक सांसदों और विधायकों को उचित आदर नहीं दिया, प्रवक्ताओं से नौकरों जैसा सलूक किया और कार्यकर्ताओं के साथ भी रवैया ठीक नहीं रहा। दत्ता ने कहा, 'ममता बनर्जी ने जिस संगठन को अपने खून-पसीने से सींचकर खड़ा किया, उसे अभिषेक बनर्जी ने अकेले ही तबाह कर दिया और उसके पतन की वजह बने।' उनके मुताबिक, अभिषेक बनर्जी के कारण ही कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी से किनारा कर लिया।

'एक शख्स ने पूरी पार्टी की साख गिराई'

दत्ता के अनुसार, सुवेंदु अधिकारी को पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया गया, वहीं तपस रॉय और निशीथ प्रमाणिक को भी संगठन से अलग-थलग कर दिया गया। उन्होंने कहा कि एक ही व्यक्ति ने समूचे दल की छवि को धूमिल कर दिया और पार्टी की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाई। उन्होंने यह भी दावा किया कि नेतृत्व ने संगठन के हितों के बजाय आर्थिक फायदे को अहमियत दी, जिससे पार्टी की प्रतिष्ठा को ठेस लगी।

'अकेले ममता की मर्जी से विलय मुमकिन नहीं'

टीएमसी और कांग्रेस के बीच संभावित विलय की चर्चाओं पर दत्ता ने भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि कानूनी और व्यावहारिक अड़चनों के चलते ऐसा होना सरल नहीं है। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग के नियमों और दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार किसी राजनीतिक दल के विलय के लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है, जबकि मौजूदा परिस्थितियों में नेतृत्व के पास इतना समर्थन नहीं है। उन्होंने कहा, 'केवल ममता बनर्जी की इच्छा भर से कांग्रेस में विलय नहीं हो सकता। इसके लिए हर स्तर के नेताओं की रजामंदी जरूरी है। पार्टी के सांसद भी पूरी तरह साथ नहीं हैं।'

'विलय हुआ तो चुनाव चिह्न और फंड का क्या होगा'

दत्ता ने सवाल उठाया कि अगर विलय हुआ तो टीएमसी के चुनाव चिह्न और पार्टी के तकरीबन 1,200 से 1,300 करोड़ रुपये के फंड का क्या होगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व, खासकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की सहमति तथा सकारात्मक रुख जरूरी होगा। दत्ता के इन बयानों से पश्चिम बंगाल की सियासत में नई बहस छिड़ गई है। फिलहाल टीएमसी की ओर से इन आरोपों पर कोई तुरंत प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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