क्या बीजेपी के लिए आसान रहेगा समर्थन जुटाना?
कार्यक्रम में इन दिनों सियासत में चर्चा का विषय बने एक नए शब्द "मिशन 360" पर विस्तार से बातचीत हुई। यह महज लोकसभा की सीटों की गिनती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे उन बड़े संवैधानिक और राजनीतिक बदलावों से भी जोड़कर देखा जा रहा है, जिनकी चर्चा काफी समय से चल रही है। महिला आरक्षण विधेयक को अमल में लाने, परिसीमन और "वन नेशन, वन इलेक्शन" जैसे विषयों को लेकर राजनीतिक हलकों में सरगर्मी बढ़ी हुई है। इसी दौरान कई विपक्षी दलों के नेताओं के बयानों से यह संकेत मिल रहा है कि संसद में सरकार के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना पहले के मुकाबले अधिक सहज हो सकता है।
बंगाल के नतीजों के बाद बदली सियासी फिजा
चर्चा में राजनीतिक जानकारों ने यह दावा किया कि पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर तेजी से बदल गई है। तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष अब खुलकर सतह पर आ रहा है और कई नेताओं के रुख में फर्क नजर आ रहा है। इसी कड़ी में वाईएसआर कांग्रेस के पूर्व सांसद विजय साईं रेड्डी का बयान भी चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर सरकार मानसून सत्र में महिला आरक्षण और डीलिमिटेशन से जुड़े कदम बढ़ाती है तो उसे दो-तिहाई बहुमत हासिल हो सकता है। इस बयान ने राजनीतिक कयासों को और तेज कर दिया है।
परिसीमन की सबसे बड़ी मार किन दलों पर?
विश्लेषकों का मानना है कि डीलिमिटेशन का सर्वाधिक प्रभाव उन दलों पर पड़ सकता है, जो लंबे अरसे से मौजूदा सीट ढांचे का फायदा उठाते आ रहे हैं। कांग्रेस और कुछ दक्षिण भारतीय दलों की चिंता का मूल कारण भी यही मसला है। हालांकि बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच डीएमके और दूसरे क्षेत्रीय दलों के रवैये में नरमी आने की चर्चा है। यदि ऐसा होता है तो संसद में सरकार की पकड़ और मजबूत हो सकती है।
विपक्षी एकजुटता पर भी खड़े हुए सवाल
वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की एकता को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। तृणमूल कांग्रेस का आंतरिक टकराव, शिवसेना (यूबीटी) में संभावित नाराजगी और अलग-अलग क्षेत्रीय दलों की भिन्न राजनीतिक प्राथमिकताएं विपक्ष के लिए चुनौती बनती दिख रही हैं। कांग्रेस की ओर से महंगाई और जनहित से जुड़े दूसरे मुद्दों पर देशव्यापी आंदोलन की तैयारी हो रही है, लेकिन सहयोगी दलों के परस्पर विरोधी बयानों से उसकी रणनीति कमजोर पड़ती प्रतीत होती है।
विपक्ष के आगे वजूद और एकता की चुनौती
कुल मिलाकर देश की सियासत एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है। एक ओर बीजेपी अपने दीर्घकालिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए संख्या बल को पुख्ता करने में लगी है, तो दूसरी ओर विपक्ष अपने अस्तित्व और एकता की कड़ी परीक्षा से गुजर रहा है। आने वाला मानसून सत्र इस राजनीतिक खींचतान की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
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